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पिता जी पर दोहे

पिता सदा आदर्श है, इनमे बसती जान।। संध्या चतुर्वेदी

हिसार टुडे।

दैव तुल्य मेरे पिता,पुजते दैव समान।
पिता सदा आदर्श है, इनमे बसती जान।।

मम्मी घर की शान है, तो पापा अभिमान।
देखो पापा के बिना, सूना लगे मकान।।

माँ जीवन आधार है, पितु हैं पालनहार।
माता-पिता के बिन लगे, सूना सब संसार।।

परमपिता की परम् कृति,धरती का वरदान।
धरती जैसा  धीर तो, धैर्य दैव समान।।

दैव तुल्य है तात जो,उनकी करिए पूज।
इस धरनी पर पिता सम, नही देवता दूज।

पिता के लिए पुत्र वा, पुत्री एक समान।
बसे पिता की तो सदा, बेटी में ही  जान।।

मात-पिता घर को रखे मंदिर सदृश पवित्र।
दोनों के ही प्रेम से,घर महके ज्यो इत्र।

माता घर की नींव है, तो पितु छत्र समान।
मात- पिता से ही मिले,जग में सब को मान।।

पापा की मौजूदगी,खुशियों से भरपूर।
पिता अगर है साथ तो ,बच्चे दुख से दूर।।

साये में तो पिता के,होते हम मशहूर।
दुःख तकलीफों से हमे, रखते कोसो दूर।।

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