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तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था

आमिर खान की फिल्‍म ‘दंगल’ में गीता फोगट के बचपन की भूमिका निभाने वाली कश्मीरी बाला जायरा वसीम के अचानक से फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने के फैसले ने उनके लाखों प्रशंसकों को सदमे में डाल दिया है

हिसार टुडे। देवेन्द्रराज सुथार

तू इस आँचल से एक परचम
बना लेती तो अच्छा था
हिजाब ऐ फितनापरवर अब उठा लेती तो अच्छा था…
खुद अपने हुस्न को परदा
बना लेती तो अच्छा था…

तेरे माथे पे ये आँचल
बहुत ही खूब है लेकिन…
तूइस आँचल से एक परचम
बना लेती तो अच्छा था।

आमिर खान की फिल्‍म ‘दंगल’ में गीता फोगट के बचपन की भूमिका निभाने वाली कश्मीरी बाला जायरा वसीम के अचानक से फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने के फैसले ने उनके लाखों प्रशंसकों को सदमे में डाल दिया है। जायरा ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से यह ऐलान करते हुए लिखा कि, ‘फिल्मों में काम करने के कारण मैं इस्लाम से दूर हो रही थी, इसलिए मैं अब फिल्मों में काम नहीं करना चाहती। मैं इस्लाम में पुन: लौटना चाहती हूं।

जायरा की इस पोस्ट के कई मतलब निकलकर सामने आ रहे हैं। आखिर उन्हें ऐसा फैसला अभी ही क्यों लेना पड़ा? खासकर उन्होंने इस्लाम से दूर होने की बात कहकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जायरा के इस निर्णय के बाद सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सिलसिला शुरू हो गया। बॉलीवुड एक्ट्रेस रवीना टंडन से लेकर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने जायरा के इस फैसले को लेकर नाराजगी जाहिर की है। न तो इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं के फिल्मों में काम करने पर मनाई है और न ही इस्लाम उनकी कला एवं प्रतिभा के आड़े आता है। यदि ऐसा होता तो आज सिने जगत में हमें कई मशहूर मुस्लिम अभिनेत्रियां देखने को नहीं मिलती।

तो आखिर क्यों जायरा को ऐसा महसूस होने लगा कि उनके फिल्मों में आने के कारण वे इस्लाम से दूर जाने लगी है। क्या यह कट्टरपंथियों की सोची समझी साजिश तो नहीं जो कतई नहीं चाहते हैं कि कश्मीर की कोई मुस्लिम लड़की फिल्मों में काम करें और उससे प्रेरणा पाकर दूसरी लड़कियां भी इस राह पर चल पड़े।

निःसंदेह जायरा के करियर का सफर शुरू होने से पहले ही संन्यास लेने का ऐलान इन्हीं धर्म के ठेकेदार व कट्टरपंथियों की महिला विरोधी संकीर्ण सोच का परिणाम है

, जो कभी मुस्लिम महिलाओं के द्वारा सिंदूर लगाने पर, तो कभी बुर्के से चेहरा नहीं ढकने पर तिलमिला उठते हैं। उन्हें लगने लगता है कि इस्लाम खतरे में आ गया है। इस्लाम का नकाब ओढ़कर अपनी मर्जी से धर्म की व्याख्या करने वाले इन तानाशाह धर्म के माफियाओं को महिलाओं की आजादी नागवार गुजरती है।

उनका हंसना और खुलकर बातें करना उन्हें पीड़ा देता है। यहीं कारण है कि वे गाहे-बगाहे अपनी धमकियों, फब्तियों व फतवों के बल पर नन्हीं प्रतिभा के पंखों को ठीक तरीके से आसमान में उड़ने से पहले ही काटना चाहते हैं। जायरा को कई बार इन कट्टरपंथियों व अलगाववादियों की धमकियों से जूझना पड़ा। और आखिरकार उन्हें विवश होकर अपने हुनर का गला घोंटकर फिल्मी सफर पर हमेशा के लिए विराम चिन्ह लगाना पड़ा।

जायरा जैसी होनहार अदाकारा के लिए कश्मीर की वादियों से निकलकर फिल्मी कैनवस तक पहुंचना आसान नहीं था। उन्हें माता-पिता से लड़कर ऑडिशन में सिलेक्ट होकर फिल्मी दुनिया में प्रवेश लेना पड़ा था।

जायरा से किसी को ऐसी आशा नहीं थी कि वे कट्टरपंथियों से डरकर या इस्लाम से दूर होने जैसी बात को लेकर इतना बड़ा फैसला ले लेगी। अपनी अदाकारी के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत चुकी दंगल गर्ल वास्तविक दुनिया में कट्टरपंथियों व अलगाववादियों से क्यों डर गयी?

क्या इसे कट्टरपंथियों की जीत समझी जाए? सोचनीय है कि जायरा जैसी धाकड़ गर्ल ही यदि कट्टरपंथियों की कोरी धमकियों से डरकर इस तरह का निर्णय लेगी तो उन्हें अपना रोल मॉडल मानने वाली लाखों उबरती प्रतिभाओं का क्या होगा? जायरा का यह फैसला कश्मीर के उन दर्दनाक हालतों को बयां करता है जहां लड़कियों को बुर्के से बाहर झांकने से पहले भी दस बार सोचना पड़ता है। कट्टरपंथियों ने धर्म के नाम औरत जात पर इतनी बंदिशें लगा दी है कि उनका जन्नत की हसीन वादियों में भी दम घुटने लगा है। जब तक महिलाएं इन धर्म के छिछले ठेकेदारों के प्रति डटकर मोर्चा खड़ा नहीं करेंगी, तब तब ये अपनी हुकूमत के बूते और न जाने कितनी प्रतिभाओं से उनका आसमां छीनने का दुस्साहस करते रहेंगे।

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