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आत्मकथाएँ

बदरा आवरण राग मल्हार,रिमझिम फुहारों की आस।

हिसार टुडे । शावर भकत “भवानी”

बदरा आवरण राग मल्हार,रिमझिम फुहारों की आस।
वक्त से वक्त को चुराए क्षण, तुम्हारे यादों हेतु मानो प्रतीक्षारत।

जीवन झंझावात मध्य यादों की धुंध,
हटाए सहसा हवा का झोंका।

अन्तर्मन सूची में स्मृतियों की सूखी पत्तियों की कसमकस।
अधूरे प्रेम पृष्ठों की सरसराहट, प्रीत ऋतु पद्चाप
स्मृति पदचिह्न, स्वतः निःशब्द इशारों के धरातल में ध्वनित।

प्रात बयार हो या सिंदूरी सांझ बेला ,
मात्र एक प्याली चाय  के इर्द गिर्द,

निःशब्दता में अन्तर्मन स्वतः मुखरित।
फुर्सत के क्षण और चुप सी तन्हाई में,
पीयूष सम चाय की एक-एक बूँदे,
हमारे अनकहे भावनाओं की हरी पत्तियाँ ,
जीवन यथार्थ शक़्कर एवं मरीचिका दूध में मिश्रित।

पारदर्शी नीर की उबाल में शब्दों की नियति संग
चाय के उठते वाष्प की चुस्की संग
जीवनपथ में अग्रसर।पिघलते वक्त के साये में,
तुम्हारी निःशब्दता की यादों के कारण ,
अक़्सर मेरी चाय ठंडी हो जाती है।

ठंडी चाय की चुस्की का स्वाद सिर्फ़ मैं और तुम महसूस कर सकते हैं
क्योंकि यह ठंडी चाय, भावनाओं की हरी पत्तियाँ,
प्रेम पराकाष्ठा पुस्तक , संगीत एवं एक -दूजे की
यादें ही तो हमारे जीवन की आत्मकथाएँ हैं।

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