युवा प्रतिभा

सास बिन ससुराल सुना लगता है

Hisar Today

संध्या चतुर्वेदी, अहमदाबाद, गुजरात

सास बिन ससुराल
सुना लगता हैं,
पुरा परिवार अधुरा लगता हैं।
सुनी सुनी सी बगिया का हर फूल मुरझाया लगता हैं।
सास बिन परिवार
अधूरा लगता हैं।
माँ की लोरी की सी,
याद बातें उनकी आती हैं।
कानों में नित दिन
आवाज उनकी आती हैं।।
कमी हर बात में
नजर आती हैं आप की
घुसते ही घर में नजर
उन्हें तलाशती हैं।
सास बिन ससुराल
अधूरा लगता हैं।
जब होती अनबन
जरा सी,
याद उनकी आती हैं।
माँ की सी फटकार,
अब बहुत रुलाती हैं।
कैसे भूले दिवस साथ
जो बिताये थे।
हाथ पकड़ कर ग्रहस्थी के नियम
सिखाये थे।
बेटी से बहु बनी,
जब हाथ सास ने
थामा था।
बहु से माँ बनने का सफर उन के आँचल में सीखा था।
जब जब रोई मेरी
आँखें माँ बन आंसू पोछे थे।
छोड़ गई अब साथ हमारा,
अब सुसराल अधूरा है।
कल तक थी छोटी
बहू मैं,
अब जिम्मेदारी
निभानी है।
माँ अभी तक नही हुई
बहु आप की सयानी हैं।।
आंखे नम है आज सभी की,
आज हुई अंतिम
विदाई हैं।
सभी के दिलों में
माँ आप की मूरत अभी
समायी हैं।।

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