युवा प्रतिभा

सत्य/ सत्य पराजित है खड़ा | खुश हूँ मैं अपने लिए ना

सत्य पराजित है खड़ा,
झूठ का होता सम्मान।
मान अपमान के भवर में
डूब रहा सच्चा इंसान।।
नैया सच की है डोलती
और खिवैया झूठो का यार।
जब नैया डुबाये खिवैया ही
फिर कैसे हो नैया पार।।
चल रहा चाल झूठ अब,
कर देगा सच को बेजार।
ठगते इस संसार में
रोज सच पर होता अत्याचार।।
चापलूसी के दौर में क्या सच अकेला पड़ जाएगा।
विश्वास का सूरज क्या
कभी कहीं से नजर आएगा।।
उम्मीदों की डोर को
कभी भी सच ना छोड़ता।
झूठ मजबूत हो मगर एक दिन जरूर दम तोड़ता।।

खुश हूँ मैं

अपने लिए ना सही,
दिखावे के लिए ही सही
पर, खुश हूँ मैं
झूठ का ही सही,
पर बहोत खुश हूँ मैं
अब किसी को फिक्र नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
उनके जुबाँ पे
मेरा जिक्र नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
अब वो सुकून भरी
बात नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
तन्हाई के सिवा
कोई साथ नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
अब कोई यारों
जैसा यार नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
किसी को मेरा इंतज़ार नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
अब jokes नहीं, बस दर्द निकलता है
इस बात से खुश हूँ मैं
अब हर मौसम बस आँसू बरसता है
इस बात से खुश हूँ मैं
मेरा सच भी मुझसे झूठ बोलता है
इस बात से खुश हूँ मैं
मेरी कमाई ही
मुझको कर्ज समझता है
इस बात से खुश हूँ मैं
मेरे साथ गुजरे लम्हों का कोई मोल नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
अब मेरा वक़्त
अनमोल नहीं है
इस बात से खुश हूँ मैं
तेरे सिवा कोई दवा नहीं
इस बात से खुश हूँ मैं
और तू मेरा हुआ नहीं
इस बात से भी खुश हूँ मैं
थोड़ा और
नज़रअंदाज़ किया कर, अच्छा लगता है
इस बात से खुश हूँ मैं
मुझसे होकर जो
गुजरती है
उस हालात से
खुश हूँ मै
तेरी हर बात से खुश हूँ मै
और अपने भी
इस बात से खुश हूँ मैं

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