युवा प्रतिभा

संस्कृत और संस्कृति

आशुतोष
पटना (बिहार)

संस्कृति की
जन्भदात्री है,
यह हमारा देश।
अलग-अलग धर्म है,तनिक भी नहीं द्वेष।।
ऋषि मुनि
गुरूजन का,
संस्कृत था प्राण।
रचते-रचते रच दिए, कितने ही
वेद-पुराण।।
धरा रही दानवों की,
भूल गयी संस्कृति।
हिंसात्मक
न सोच हो,
ना फैलेगी विकृति।।
संस्कृत से
समाज का,
कालान्तर से उद्धार।
नित-दिन उजागर हो, सभ्यता का द्वार।।
जन्मदात्री है
भाषा की,
मनीषियों की शान
पढ़ते-पढ़ते दे गए, हमें संस्कृति का ज्ञान।।
धर्म
हरिनाम में ही बसा है,
आज ज्ञान का आधार।
जो भाव से जप करे,
पाए फल अपार।।
हरि गुण का आभास था, लगा दिया ध्यान ।
भक्त प्रहलाद की आस, आएँगे जरूर नारायण।।
हरि मिले श्रद्धा भाव से, कहते हैं वेद पुराण।
दो घडी मन से जप लो, बेडा पार करेंगे हनुमान।।

सतयुग बीता
धर्म से, है
कलयुग को
अभिमान।
बीते समय की
बात पर, भला
कैसे हो गुमान।।
पग-पग पर
फैले है,साधु संत फकीर।
मौके की ताक है,
कब मिल
जाये जंजीर।।

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