युवा प्रतिभा

श्रमिक तेरी कहानी

Hisar Today

मंदार गजानन राजे
कवि

कभी रात में तारों
को देखके सोचता हूँ,
एैसी उड़ान भरूँ कि
ये दूरी ना रह जाए
क्यों ना यूँ की जाए
नज़रों से बात,
लफ़्ज़ों में कहना
ज़रूरी ना रह जाए
वादा कर लूँ कुछ यूँ
अपने ख़्वाबों से,
होश में आने की
भी मंज़ूरी ना रह जाए
उतार तो दूँ पन्नों
पे पर डरता हूँ,
बतानी थी जो कहानी
अधूरी ना रह जाए
इतनी सारी हैं मेरे
मन की ये बातें,
मन में ही पूरी की
पूरी ना रह जाए
जादू होता है कुछ
हवाओँ में भी,
ना चलें तो ये
ख़ुमारी ना रह जाए
सुहाने हैं ये नए रास्ते भी,
कारवां नया फिर भी
मंज़िल पुरानी ना रह जाए
उम्मीदें आरजुयें
खेलती है यूँ मेरे दिल से
पलट आती हैं
मौजें जिस तरह
टकरा के साहिल से
भूली बिसरी
चंद उमीदें, चंद
फ़साने याद आये
तुम याद आये
और तुम्हारे साथ ज़माने याद आये
ठंडी सर्द हवा
के झोंके आग
लगा कर छोड़ गये
फूल खिले
शाखों पे नए
और दर्द पुराने
याद आये
हंसने वालों से
डरते थे छुप छुप कर
रो लेते थे
गहरी गहरी
सोच में डूबे,
दो दीवाने
याद आये

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