युवा प्रतिभा

शिष्टाचार और सभ्यता के हाथ कटोरा

राज शेखर भट्ट
बकराल वाला, देहरादून
भारतवर्ष, जिसे सोने की चिड़िया भी कहा जाता है, लेकिन अब केवल भ्रष्टाचार का कौवा ही बचा हुआ है। जिस देश में संस्कृति के सागर हुआ करते थे, वहां केवल नदियां बची हुयी हैं। जहां सभ्यता की हवाओं में पुष्प लहराते थे, वहां असभ्यता की ‘लू’ से पुष्प मुरझा रहे हैं।
जहां शिष्टाचार की छांव में जीवन पलता था, वहां अशिष्ट काली रातों ने घेरा डाल दिया है। जहां अनेकता में एकता हुआ करती थी, वो भी समाप्ति के कगार पर नजर आती है। लोग साथ मिलकर चला करते थे, अब पीठ पर छुरा मारने को तैयार रहते हैं। हर रिश्ते के प्यार और मिठास ने नफरत और खटास का चोला पहन लिया। सबकी सोच स्वयं तक ही सीमित है, अच्छा है। क्योंकि हर किसी को अपना जीवन ही संवारना और निखारना है। लेकिन ऊंचाईयां पाने के लिए सभ्यता और शिष्टाचार को कटोरा पकड़ा देना भी सही नहीं है।
माता-पिता, भाई-बहन, पत्नि सभी रिश्ते तब भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे। लेकिन अब वो प्यार-दुलार, वो शिष्टाचार, वो तहजीब, वो अदब नहीं रही, जो जीवन का आधार हैं। अब बेटा मां को नहीं पूछ रहा है तो बाप दारू पीकर गालियां बड़बड़ा रहा है। बेटी कब घर से जा रही है और कब आ रही है, कोई समयसीमा नहीं। सच की छतरी ओढ़कर झूठ की चादर बुनी जा रहीं हैं। काम करने को कोई तैयार नहीं और शौक नवाबों के पाले हुये हैं। बेटा बाप को मार रहा है और बेटी मां को सुनाकर अपना जीवन जी रही है। यह है संस्कृति और सभ्यता की नदियां, जो काले साये के साथ सूखने जा रही हैं। भारतवर्ष की संस्कृति और वेषभूषा का पूरे संसार में बोलबाला है। हर देश भारत की संस्कृति, वेषभूषा और खान-पान से मंत्रमुग्ध है। लेकिन अब तो विकास हो चुका है। भारत में जो कमियां थी, पूर्ण हो चुकी हैं और नयापन आ चुका है। सभी को पता है मानवजाति नग्न अवस्था में उत्पन्न हुयी थी और खान-पान से भी जान-पहचान नहीं थी। शरीर को ढकने के लिए स्वयं ही कार्य किये गये और सफलता भी प्राप्त की। लेकिन समय बदलते-बदलते इतना बदल गया कि कपड़े कम और नंगापन बढ़ रहा है। वैसे भी यह एक राउंड सर्किल की तरह है, जो जीरो से शुरू हुआ था और जीरो की ओर वापसी कर रहा है। इनसान नंगा आया था, फिर बदन ढकने लगा।
अब कपड़े छोटे हुये और अर्द्धनग्न तो हो चुका है। पूर्ण नग्नता का काला साया समाज को अपनी आगोश में लेने में भी देर नहीं करेगा। भारतवर्ष की वेषभूषा छोटी हो चुकी है और संस्कृति से पहले ‘कु’ लगने में भी देर नहीं है।

शादी से पहले प्यार होता नहीं था और अगर हो भी गया तो शादी तक रहता था। अब वही प्यार केवल एक फैशन बनकर रह गया है। अब इज्जत, फिक्र और ख्याल नहीं बल्कि इच्छा, गुस्सा और शरीर तक सिमट चुका है। न अब प्यार बचा हुआ है और न ही प्यार करने वाले। ज्ञान और सम्मान तो हमेशा ही रहा है और अब भी है लेकिन तहजीब नहीं। समाज में अधिकतर देखने को मिलता है कि जिसने लम्बा सफर तय किया। अच्छे ज्ञान के साथ अच्छा पद पाने के बाद उसके मिजाज ही बदल जाते हैं। जिनके साथ खेलकूद करके बड़ा हुआ, जो उसके अपने थे। वक्त ऐसा बदला कि इन्हीं के लिए उसके पास समय नहीं बचा। अगर मुलाकात हो भी जाती है तो बोलने में तीखापन, स्वभाव में ऐंठ और चेहरे पर अकड़ रहती है।
हमारा देश आर्याव्रत, भरतखण्डे, जम्बूदीप आस्था से परिपूर्ण है। लेकिन अब कितनी बची है आस्था और कितने बचे हैं आस्था के पुजारी। जहां भक्ति के रस से मन तृप्त होते थे, भक्त पूर्ण निष्ठा और लगन के साथ भजन-कीर्तन करते थे। अब वहीं भक्ति ही खत्म हो चुकी है, बची है तो बस बाबाओं की छत्रछाया। ज्ञान और भक्ति केवल बाबा और सत्संग तक ही सीमित रह चुकी है। परन्तु उस ज्ञान को पाकर भी लोगों की समझ पर लगे रोड़े हट नहीं रहे हैं। जब ज्ञान देने वाले बाबा आशाराम और राम-रहीम जैसे होने लगे तो मिल गया पूर्ण ज्ञान। क्योंकि सात्विक तृप्ति और तामसिक तृप्ति पूर्ण होना, अलग-अलग है।
बहरहाल, वर्तमान में संस्कृति, सभ्यता, शिष्टाचार, अपनापन, रिश्ते, परिवार, दोस्ती और प्यार अब किताबों तक ही सिमटकर रह गये हैं। ये सारे शब्द अब केवल दिखावटी आईना के साथ हैं। क्योंकि इन शब्दों के अर्थ और इनके विस्तार को कोई जानना नहीं चाहता है। अब इन किताबों का अध्ययन ज्ञान के लिए कम और डिग्रियों के लिए ज्यादा होने लगा है। सभी खो गये हैं पैसे की दुनिया में, सभी जी रहे हैं मतलब की दुनिया में। जिन रिश्तों के लिए जान दी जाती थी और जिनकी इज्जत को परदे के अन्दर रखा जाता था। अब उन्हीं रिश्तों के नाम पर अराजक शब्द प्रयोग में लाये जाते हैं। माता, पिता, बहिन जैसे रिश्तों की गालियां देना, अब यह है शिष्टाचार। जितनी लोगों के पास डिग्रिया हैं, उससे ज्यादा गालियों के तीर जुबान पर स्थापित कर दिये हैं।
आम आदमी से लेकर खास आदमी तक सभी अच्छाई का चोला ओढे हुये हैं। लेकिन अपनी मीठी जुबां के पीछे अराजक वाणी को छुपाये बैठे हैं। घर-घर में मां-बहिन की गाली सुनने को मिलती है। आॅफिस में संगी कर्मचारियों का तो हाल ही अनूठा है। सामने आदर-कुशल पूछी जायेगी और पीठ पीछे गालियों के साथ बुराई। जिससे साबित होता है ‘‘मुंह में राम, बगल में छुरी’’। राजनीति, फिल्म, खेल, शिक्षा, सरकारी और प्राईवेट कोई भी क्षेत्र ऐसे शिष्टाचार से अछूता नहीं है। क्योंकि अब शिष्टाचार केवल किताबों तक ही सीमित रह गया है। अभिवादन में बोले जाने वाला ‘आप’ बदल गया है ‘तुम’ में और ‘तुम’ बदल गया है ‘तू’ में। इज्जत काली कोठरी में कैद है तो तहजीब सड़कों में तांडव मचा रही है। संस्कृति लकड़ी की भांति सूख रही है तो सभ्यता काले आसमान की तरफ जा रही है। अपनापन का कुनबा वैलिडिटी वाला शिष्टाचार साथ लेकर चल रहा है। शिष्टाचार रह गया किताबों तक और केवल शिष्ट अचार बच गया हैं। जिसमें कुसंस्कृति का तेल, अशिष्ट मसाले, झूठा नमक, नंगी मिर्च बची है। सभी इसी के पीछे भाग रहे हैं और अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हैं।

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