युवा प्रतिभा

शब्दों की मिट्टी से महफिल सजाता हूं

पुस्तकें या कहो किताब मेरे हृदय की धड़कन के समान है

सुदर्शन गुप्ता | जीवन मंत्रा
पुस्तकें या कहो किताब मेरे हृदय की धड़कन के समान है। मैं आज अगर जिन्दा हूं तो मेरे कागज की सुन्दर पुस्तकों के कारण ही तथा सुबह-सवेरे जब मैं बिस्तर से उठता हूं तो सबसे पहले पुस्तकों का ही अध्ययन कक्ष में जाकर निहारता हूं और फिर कलम या कहो पैन हाथ में लेकर लिखने का मन अपने आप हो ही जाता है। जीवन में बचपन से एक ही शोक सबसे ऊपर रहा कि किताबें पढूं और सुन्दर रचनात्मक शब्द या मन के भाव कागज पर उतारूं।
छोटा था स्कूल जाता था तो कपड़ों, जूतो तथा बालों का श्रृंगार नहीं किया परन्तु अपने कायदे किताबों पर सुन्दर कवर जरूर लगाए ताकि इनकी हिफाजत या सुरक्षा हो सके। पुस्तक सदैव मुझे प्राणों से या जीवन से अधिक प्यारी लगती है। बचपन में शोक लगा था पुस्तकालय जाने का 1960 में जो कि आज भी विद्यमान है। उन दिनों पुस्तकालय घर से 1 किलोमीटर दूरी पर रेलवे रोड़ पर था और इसी बहाने शाम का पैदल घूमना भी निष्चित हो जाता था। पढ़ने के बाद ही रोटी-सब्जी अच्छी लगती थी।
आज भी मेरे मन का यही हाल है। उन दिनों बचपन में अखबार या पुस्तक खरीदने के पैसे जेब में होते नहीं थे परन्तु शहर का पुस्तकालय रेलवे रोड़ हिसार में बहुत ही बढ़िया था। वहां पर बैठकर ज्ञान अर्जित करने का मजा आजकल कहीं भी नहीं मिलता है।
एक जैन लाइब्रेरी भी होती थी जहां आज हिसार में महाराजा अग्रसैन चैक है या कहो पारिजात चैक का चैराहा है। शब्दों से किताबों से मेरा पूर्व जन्म का रिष्ता प्रतीत होता है। किसी दूसरे शहर में शादी में मृत्यु में, अस्पताल में या कहों घूमने भी जाओ या कुछ पल मुझे मिले, तो सबसे पहले उस जगह की किताब खरीदना चाहूंगा। किताब ना मिले तो पुस्तकालय में बैठकर, लिखकर अपने आप को अच्छा तथा गौरवान्ति अनुभव करता हूं। पढ़ने को पुस्तक मिल जाए तो फिर खाना या पानी मिले या ना मिले, मैं कई दिन एक कमरे में बैठकर अच्छा समय तथा स्वास्थ्य बिता सकता हूं बशर्ते के पुस्तक मेरे हाथ में हो।
धन का अभाव रहा पर पुस्तकों का अभाव कभी बर्दाश्त नहीं किया। अपने मित्रों की पुस्तकों को जान से अधिक प्यार किया। पुस्तकों का मेला जहां कहीं भी हो वहां जाकर लेखकों की आत्मा से सदैव परिचय किया। लेखकों का सम्मान मेरे दिल में सबसे अधिक है। लेखकों की जीवनी पढ़ने से बहुत कुछ मिला तथा आज भी मिलता है।
कुबेर का खजाना नहीं मिलता पर अनुभव और प्रतिष्ठा तो मिलती है। यात्राओं पर सदैव मैंने किताबों का सहारा लिया और आज के डिजिटल युग में भी कागज को जब मैं स्पर्श करता हूं तो मेरे मन का कमल भाव विभोर हो उठता है। तथा अगर कोई भी मेरी पुस्तक गुम हो जाती है या कोई मित्र किताब के पृष्ठों को ठीक ढंग से प्रयोग नहीं करता तो मेरे दिल को चोट पहुंचती है। जीवन में पहला अच्छा ईनाम मुझे काॅलेज में प्रथम आने पर तीन पुस्तकों का सैट मिला था जो कि मैंने आज भी संभाल कर रखा हुआ है।
जिन गुरुओं ने या कहों शिक्षकों ने मुझे पुस्तकों से पढ़ाया उनका आज भी सम्मान करता हूं। उनके दिए शब्दों के जखीरे से मैं जीवन यापन कर रहा हूं। मैं अगर किसी को उपहार देना चाहता हूं तो सबसे पहले पुस्तक या पैन ही देना चाहूंगा। बच्चों को संस्कार देने है तो पुस्तकें या कलम दो। उनका और आपका दोनों का जीवन सफल होगा। मैंने 70 वर्ष की आयु में आज तक अधिक से अधिक पुस्तकें मित्रों को और रिश्तेदारों को भेंट की है। या कलम और सुन्दर लिखने के लिए पैन दिए है।
पुस्तकालय मेरा दिमाग है और अच्छा संग्रह तथा संकलन मेरी यादों में बसा है। हाथ से अखबार का पृष्ठ पलटने का अपना ही आनन्द है और कागज को स्पर्ष करने का भी सुखद अनुभव भी होता है और रोमांच भी आता है। जब भी मैं पुस्तकालय के आसपास से गुजरता हूं तो समय निकालकर उन अलमारियों में मेरे प्रिय लेखकों की धड़कन सुनता हूं, पढ़ता हूं और उनको अमर करता हूं।
दोबारा अपने शब्दों में लिखकर बचपन से लेकर यौवन तक तथा आगे की यात्रा भी मैं पुस्तकों तथा पैन के द्वारा ही अच्छा स्वास्थ्य हासिल करूंगा। ये संस्कार बच्चों में अधिक से अधिक वितरण करूंगा। मेरे देष की सभ्यता संस्कृति में अनेक ग्रन्थ है, ज्ञान है जो कि विश्व को सुगम पथ प्रदान कर रहे हैं। अध्यात्म, योग, वेद पुराण संसार को भारत की अनूठी देन है। कालान्तर में विदेशों के यात्री हमारे भारत के महाविद्यालयों में ज्ञान अर्जित करने नालान्दा तथा तक्षशिला में आते रहे है।
इतिहास गवाह है कि भारत के लेखकों का वर्चस्व संसार में आज भी सबसे ऊंचा है और आने वाले समय में भी हम आगे रहेंगे। आज के लेखकों को मां सरस्वती तथा कुबेर जी की कृपा सदैव बरसती रहती है। इन लेखकों की आत्माएं किताबों मंे निवास करती है, आकाश में विचरण करती है और अजर-अमर है। किताबों की महक मेरी सांसों में होगी, दिल के झरोखों में, मेरी यादों में स्मृतियां सदा रहेगी।
कारीगर हूं शब्दों की
मिट्टी की महफिल सजाता हूं।
किसी को बेकार,
किसी को लाजवाब
नजर आता हूं।
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