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व्यंग्य : नाक के आस्तित्व की लड़ाई

सलीम रजा
लेखक

कमबख्त ये नाक है बड़ी बुरी चीज़। जिसे देखो वो अपनी नाक के लिए जी रहा है और अपनी नाक के लिए ही मर रहा है। अब नाक छोटा-बड़ा बच्चा-युवा जवान-बूढ़ा सभी की अस्मिता का सवाल बन गई है मानो इंसान के पूरे शरीर में नाक का ही अपना वजूद बचा है। ऐसा लगता है कि नाक इंसानी रूप,श्रंगार का पर्याय बन चुकी है। अरे ये तो मै भूल ही गया कि एक कहावत भी है जो बहुत पुरानी है और शायद जन्म-जन्मांतर तक ये कहावत दोहराई भी जाती रहेगी ‘‘ जिसके नाक न हो वो…खा ले’’ अब आप ही देख लो ये नाक सियासत के मायके से निकलकर मंचों की ससुराल तक पहुंच गई। हर किसी की नजर सियासत के वांाचाल की नाक पर जाकर टिक गई, अब न तो दिमाग की जरूरत है और न आंखों की, भले ही सियासत में शरीर के अनमोल अंग छिन्न-भिन्न क्यों न हो जायें नाक बचनी चाहिए मानो नाक ही जेवर है। अब देखिये चुनावी अखाड़े में हर किसी को परवाह है तो सिर्फ नाक की। सियासी मंचो पर जिस तरह से विपक्षियों को आहत करने वाली अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया गया है ऐसी अमर्यादित भाषा तो किसी स्मार्ट सिटी के नदी किनारे बसने वाली मलिन बस्तियों में भी नहीं सुनाई देती है। जिन्हें हम आप कभी भी सवीकार नही कर सकते लेकिन इन सियासी मठाधीशों के आगे नतमस्तक होकर हम अपने दोनों हाथों को पीट-पीट कर लाल कर लेते हैं। ये दोहरी मानसिकता और दोहराचरित्र पालने वालों से पूछोे तो जरा कि देश एक चरित्र एक चुनाव और राष्ट्रवाद की राह पर कब और कैसे चलेगा। यहां पर भी नाक आड़े आ जायेगी। दरअसल नाक ही सबसे बड़ी तरक्की में बाधक है अगर नाक न होती तो देश की तस्वीर और तकदीर इन्हीं पांच सालों में बदल जाती। अब पूछिये कैसे। तो भईया जब देश के राजा यानि मास्टर जुमला ने रोजगार-रोजगार का राग अलापने वाले को कहा, ‘‘पकौडे’’ बनाना शुरू कर दो रोज की आमदनी, देश में चटोरों की वैसे भी कमी नहीं है रोजगार दिन दूना रात सवाया चलेगा बस मुई ये नाक बीच में आ गई विरोध की फुलझड़ी जलने लगीं तो मास्टर जुमला की पेशानी पर भी चिन्ता की लकीरें खिच गई, लगे सोचने आखिर समझ में आ गया आखिर स्टेटस भी तो कोई चीज है।

अपने समुद्र रूपी दिमाग मंथन से मास्टर जुमला ने रत्न निकालकर पकड़ा दिया जनता को ‘‘मै भी चैकीदार तू भी चैकीदार हम सब चैकीदार’’ बस फिर क्या था इस नाक में होने लगी खुजली फड़कने लगी नाक मच गया चारो तरफ कोहराम हर विपक्षी रूमाल से अपनी नाक ढ़के चिल पों मचाने में मशगूल है अन्र्तविरोधी भी मुह सिकोड़कर नाक देखने लगे इसी नाक ने मुई भरी सभा में जूता स्ट्राईक करा दी थी। अब नाक की ही तो फिकर है जो हाथ पर बैठकर देश भ्रमण करने वाले ‘‘मिस्टर पप्पू’’ अमेठी से वायनाड का परिक्रमा लगाने लगे। बहरहाल हम सब भले ही नाक रखते हों लेकिन हम हैं समझौता वादी सिद्धान्त वाले ,लेकिन सियासत में शायद सिद्धान्तों का कोई औचित्य नहीं रहा। इन सियासत के ब्रहम्राक्षसों ने सिद्धान्तों की बलि चढ़ा दी। इसी नाक ने देश को पोलियो ग्रस्त बना दिया जो छिन्न-भिन्न पार्टी रूपी बैसाखी के सहारे घिसट रहा है,ऐसे में एक पार्टी एक चुनाव, समान अधिकार, समान वेतन पर नाक को अस्मिता का सवाल न बनाकर जब तक बहस नहीं होगी तब तक राष्ट्रवाद की बात करना शायद उचित नहीं होगा।

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