युवा प्रतिभा

व्यंग्य कविता / बगूला

आशुतोष
पटना बिहार

तन उजला
जैसे ‘बगूला’
टकटकी
निगाह जैसे ‘गिद्ध’
उगले जहर
जैसे ‘विषधर’
शोर मचाये
जैसे ‘मचहट्टा’
बन जाये मुख्य रिपोर्ट।
बंडी कुर्ता ठाठ बाट
माइक पर
करे किलहोर
सच का कचूमर निकले
झूठ पर
मचाये शोर।
बाईट राईट
नही नैतिकता से परे
कह देते पार्टीयों
के लाईन नही
झूठ का नकाब
पहने ऐसे
सच्चाई से
इनको
सरोकार नहीं।
राष्ट्र और
जनता की बात कहाँ
ईमान धर्म
गयी तेल लेने
अपनी विकास
होती रहे
इसलिए सभी
आये वोट लेने।
देखो इनके
बदलते रंग रूप
सांसद विधायक
बनते ही
बन जाते सेठों के सेठ
वक्त आने पर किसी को न देते भेंट।
बचपन और चाँद
———————
नीले नभ में
चाँद चकोर
विखेरे सौन्दर्य
अनमोल
टिमटिमाते
ढेरों सितारे
टुकटुक देखे
नयन हो रहे
विभोर।
शीतलता
विखेरे चाँदनी
धरती आँचल
फैला करे शोर
तरूवर की
लता नाच रहे
वायु जब चले
चहुँ ओर।
मुग्ध कर रही
मनोरम दृश्य उन्मुक्त हो
बनी रहे सुन्दरता
आजादी की प्रवाह है
चाँद तेरी
चाँदनी और शीतलता।
बादलो में जब छिपती
उदास हो जाता हूँ मैं
पर क्या मालूम
आँख मिचोली
भी खूब सौन्दर्य
बिखराती ।
देखकर तेरी
शरारत आज
बचपन की
याद दिलाती
कभी बचपन में
इसी तरह
लुका छिपी
खेली जाती।

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