युवा प्रतिभासंपादकीय

रह जाता कोई अर्थ नहीं

दिन – रात है वो साथ मेरे,
ना पूछे मुझसे बात कोई,
मोह जब उससे खत्म हुआ,
तब पूछे मुझसे हाल मेरा,
तब रह जाता कोई अर्थ नही।
जीवन के संघर्षों में ना किया
कोई प्रयत्न उनसे लड़ने का,
यूँ ही थककर तू बैठ गया,
लूटने पर जब करता प्रयत्न
तब रह जाता कोई अर्थ नही।
घर मे जब रोते माँ बाप तेरे,
जीवन में ना पाए प्यार तेरा
मरने पर तस्वीर पर उनकी
रोज चढ़ाए फूलो की माला
तब रह जाता कोई अर्थ नही।
अपने मन की उथलपुथल को
रोज पन्नो पर ही लिखते जाना
लिखे हुए अपने ही शब्दो को
मैंने अपने जीवन मे ना उतारा,
तब रह जाता कोई अर्थ नही।
दर्द मिटाए मधुशाला
सुना है बहुत मंद
उजाले है मधुशाला में,
शायद जुगनू
भटकते है वहाँ दिन
ढले पैमानों में,
शब्दो को यूँ तो हरकोई
गुनगुनाता है अक्सर,
मतलब समझ आता है उनको
जो खुद को डूबा
आया मधुशाला के
मय के प्यालो में,
मधुशाला में कहीं
किसी को
आईने की जरूरत नही है,
यहाँ अगर किसी ने कभी
खुद को डुबाया मय में,
वो खुद ही अपने
चेहरे का नकाब
हटाकर
सच्चाई अपनी
दिखाने लगा
मधुशाला में,
हर जख्म जो
कोई किसी का अपना
भी नही समझता,
उस को भी
अनजान शख्स
पहचान लेता है
मधुशालो में,
दिन में अक्सर
जो जीवन से
थककर हार
मान गया है,
रात को मय
में डूबकर जीत गया है
वो जमाने को,
कहीं भी किधर भी
जाओ हर तरफ दर्द
बढ़ता ही जाता है।
मधुशाला में जाने
पर हर दर्द खुद
ही मिटता जाता है।।

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