युवा प्रतिभा

ये कैसा इतवार !

दिन दिन करके
बीता हफ्ता,
एक बरस जितना
लम्बा लगता!
पूरे हफ्ते की
भागम दौड़ी,
काम काज की
माथा फोड़ी,
सुबह से शाम,
रोज वही काम,
घर से ऑफिस,
ऑफिस से घर
बच्चों के ट्यूशन
तो कभी होमवर्क,
थक कर कब
सो गयी और फिर
सुबह हो गयी,
ज़िंदगी ज़िंदगी ना हुई
जैसे रीवाइंड
फ़ॉरवर्ड की टेप हो गयी,
छह दिन का
इंतजार, और आया
प्यारा सा इतवार,
सोचा था मनाऊंगी
अच्छे से आज इतवार!
मीठे सपनों की
दुनिया मे ,
सुबह देर तक
सोती रहूँगी,
फिर मन मर्ज़ी से
काम करूंगी,
यही सोच जब
हुआ सवेरा,
एक क्षण को
बगीचा निहारा,
चाय की चुस्की का
लेकर मज़ा,
दूरदर्शन पर”
रंगोली”चलाया
गीतों के सँग मैं गुनगुनाती,
मन ही मन मुस्काती,
“आने वाला पल
जाने वाला है
हो सके तो
इसमें ज़िन्दगी बिता दो
पल ये भी
जाने वाला है”
बजी जब रिंग टोन
यह मेरे फोन की….!
फोन उठाया ये सोच कर,
किसको मेरी अब
याद सतायी?
“आज ना आ
पाऊँगी मैडम”
यूँ बोली कुछ मेरी बाई!
घर पर आए
कुछ मेहमान हैं,
तबियत भी कुछ
नासाज़ है,
सुनकर बस यूँ
चक्कर आया,
चाय का मज़ा
हो गया ज़ाया।
सचमुच कैसा
पल ये आया?
कमर पकड़ कर ,
पीठ पकड़ कर,
सोचा कैसा
दिन ये आया?
उफ़्फ़ कैसा
इतवार है आया,
छुट्टी का यूँ आनंद मनाया!
कल से फिर वही दिनचर्या ,
उसको गले लगाऊँगी,
अब ना आस लगाऊँगी.
“इतवार” तुझे न बुलाऊँगी!

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