युवा प्रतिभा

मेरे धुंधले जीवन की स्पष्ट शब्दचर्या

“हम वही दुहरायी हुई
जिंदगी जीते हैं!
हर दिन को एक नयी
चमक से उठाते हैं
हाथ तक आते-आते
कितनी सारी ऊष्मा
कितना सारा आह्लाद
एक अविश्वास में
तब्दील हो जाता है!
एक झिझक भरी
स्वीकृति
इस वाक्य के दोनों
सिरों पर दौड़ती है
यही दिन मैंने उठाया था
यहीं उम्मीद से मैं
भर गया था।
जीवन श्रृष्टि का कोई
विस्मृत मंत्र है
हर बार अस्पष्ट
भाषा के साथ
समिधाएँ हवन होती हैं।
एक उतेजित
हड़बड़ाहट से
भरा मैं सोचता हूँ –
यह दिन, यही जीवन
यही आख़िरी महीने
का पहला सप्ताह
यही वर्षांत की
अंतिम संध्या
यहीं कुछ अटका,
कुछ ठिठका है
मेरे धुंधले जीवन की
स्पष्ट शब्दचर्या!
कुछ नहीं है
कहते हुए मैं भर गया हूँ।
हम वही दुहरायी हुई
जिंदगी जीते हैं
वही निराशा,
वही उम्मीद!”

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