युवा प्रतिभा

मुसलिम महिलाओं को भी मिले सामाजिक आजादी

देवानंद राय
गोरखपुर

जहां एक और दुनिया की आधी आबादी खुद को चारदीवारी से बाहर निकल जाने को आतुर है| वो खुद को एक पहचान देना चाहती है तो वहीं कुछ लोग उसे धर्म के नाम पर उसके पैरों में बेड़ियां डाल देना चाहते हैं।जबकि धर्म उसका कतई समर्थन नहीं करता।हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई जिसमें मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने के अधिकार की मांग की गई।ध्यान रहे अपने देश में अधिकतर मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है तो कुछ मस्जिदों में विशेष कायदे कानून में महिलाओं के प्रवेश हेतु जैसे मगरिब अर्थात शाम की नमाज महिलाएं मस्जिद में नहीं पढ़ी सकती,पुरुषों की तरह कतार में बैठ कर नमाज अदा नहीं कर सकती,नमाज पढ़ा नहीं सकती और न जाने कितनी कुरीतियां और बंधनों की बेड़ियां उसके लिए बना दी गई है।जो लोग इसे अल्लाह की मर्जी के खिलाफ बताते हैं, ऐसा करने पर ्अ्ल्लाह से डरने की बात कहते हैं उन्हें पहले खुद अल्लाह से डरने की जरूरत है क्योंकि कुरान या हदीस में ऐसे किसी नियम का उल्लेख नहीं है यहां तक कि पैगंबर हजरत मोहम्मद के वक्त भी महिलाएं मस्जिद में नमाज पढ़ती थी और इसे शरीयत के विरुद्ध बताने वाले लोग पहले यह बताएं कि यह देश शरीयत से चलता है या संविधान से। सभी मदरसों तथा मस्जिदों को सरकार द्वारा अनुदान मिलता है संविधान के कारण, परंतु जब खुद के नियम में बदलाव करना हो तो यह शरीयत की बात याद दिलाने लगते हैं ये दोहरा मापदंड अब नहीं चलेगा।संविधान के अनुसार इस प्रकार किसी व्यक्ति को उसके धार्मिक कर्तव्य से रोकना संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का स्पष्ट हनन है जिसमें अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता का अधिकार,धर्म,जाति,लिंग के आधार पर भेदभाव का अधिकार अनुच्छेद 15 तथा स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 21 और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 25 शामिल है।इस याचिका का विरोध में ही लोग कर रहे हैं या आगे करेंगे जिन्होंने तीन तलाक में रोड़े अटका है और हलाला जैसी सामाजिक बुराई का समर्थन करते हैं।इस मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिला संगठनों और लिबरल तथा सेकुलरिज्म का झंडा लेकर दौड़ने वाले लोगों की चुप्पी भी अनेक सवाल खड़े करती है।कहीं न कहीं उनकी चुप्पी ये भी बताती है कि समाज की वास्तविक कुरीतियों से लड़ना अलग है और फेसबुक पर शो ऑफ़ करना और चंद ट्वीट कर खुद को सबसे बड़ा फेमिनिस्ट बताना अलग है। समय है अब 21वीं सदी में मुस्लिम महिलाओं को शादी तलाक और जायदाद के साथ धार्मिक बंधन से भी मुक्त किया जाए।

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