युवा प्रतिभा

माँ की ममता सबसे न्यारी

रीना गोयल, कवयित्री
हरियाणा

दुग्ध पिलाकर
अपने उर का,
आँचल बीच
समा लेती हो।
अपने हाथों से सहलाकर,
मन की थकन
मिटा देती हो।
बोध कराती ऊंच नीच का, कर ममत्व की छाँव निराली।
प्रथम शिक्षिका मात तुम्ही हो, संस्कार सिखलाने वाली ।
अपने सुत के हित हितार्थ माँ,
तुम सर्वस्व
लुटा देती हो ।
अपने हाथों से सहलाकर ,मन की थकन मिटा देती हो ।
मानव हो या
पशु-पक्षी भी, जननी तो जननी होती है ।
स्वार्थ, कपट छल दम्भ से परे, निश्छल माँ ममता होती है ।
पशु, जीव नर और नारायण,
माता क्षुधा मिटा देती हो ।
अपने हाथों से सहलाकर, मन की थकन मिटा
देती हो ।
ऋणी हुआ
मैं माता ऋण से,
श्वाश श्वाश है
कर्ज तुम्हारा।
नहीं जुबां से
कुछ कह पाऊं, मैं बालक नादान
तुम्हारा।
विकल देख
माँ अपने सुत को,
निज के
दु:ख भुला
देती हो ।
अपने हाथों से सहलाकर,
मन की थकन
मिटा देती हो।
गगनांगना छंद
(मुक्तक)
प्रीत प्रेम से साध कलम मैं,
लिखती चाव से।
सब अमिय
धैर्य का मैं चखती
सहती भाव से ।
उसके बिम्ब प्रतिबम्ब मन में
मैंने थे गढ़े ।
नियति पर कुछ और 

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