युवा प्रतिभा

मजदूर से दूरी क्यों?

आशुतोष
पटना बिहार

मजदूर से दूरी क्यों?
होती क्यों दूर व्यवस्थाएँ?
जबकि वो तो स्तंभ है प्रगति की
रोज बनाते नव आकार
इनके हाथों से सजी
हर वो महल की
दर-ओ- दिवार।
मजबूरी इनका पीछा न छोड़े
मजदूरी करते दिन-रात
देश-परदेश की
मिट्टी मे रहकर
सजते- संवारते अपने हालात।
जरूरत की श्रृंगार से
प्रवासी की नाम से
अवहेलनाओ की चक्रव्यूह में
बूझा रहे भूख की आग।
मजदूर होते बहुत ही खास
इनके बिना न होते पूर्ण काज
फिर भी उड़ाया
जाता उपहास
नियम कानून है
पर कोई नही खास।
कभी उनके दिलो से पूछो
धूप-तपिस-बारिस में
रहकर देखो
इनके किये कार्यो
का कोई मोल नहीं
तुम सभझ बैठोगे
उसे समझ नहीं।
वो तो रत्न है
तुम्हें देकर ही जाता
चंद सिक्को की
खातिर अपना
बजूद छोड़ जाता।
गौर करोगे जब कभी
उन दर-ओ- दिवार
नजर आयेगा सामने
जिसने बनाया
वह दिवार।

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