माइ ड्रीम सिटीयुवा प्रतिभा

बचपन से ही बेटों को नारी का सम्मान और आदर करना सिखाएं

टुडे न्यूज | सोशल मीडिया
नवरात्रों में कन्याओं को देवी तुल्य मानकर पूजा जाता है.पूरे नवरात्र के दौरान देवी भक्ति में डूबे लोग बस रस्मों को निभाने का दिखावा करते हैं, लेकिन यथार्थ से काफी दूर हैं।
जिस आदिशक्ति का रात-रात भर जागरण में गुणगान करते हैं, पर वास्तविकता यह है धन की प्राप्ति, समृद्धि के लिए मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, ज्ञान, विवेक के लिए मां सरस्वती की उपासना करते हैं, अपने शत्रुओं पर विजय पाने के लिए मां काली को प्रसन्न करते हैं। लेकिन जब यही कन्या रूपी देवियांँ लड़की के रूप में उनके घर में आना चाहती हैं अजन्मी बच्चियों को कोख में मार दिया जाता है।
पाप-पुण्य के सवालों से जूझता समाज इसे पाप क्यों नहीं मानता? इसे मानवीयता के लिहाज़ से देखने की बात तो दूर इसका सामाजिक दुष्प्रभाव क्या होगा शायद इसका भी ज्ञान नहीं।सिर्फ नौ दिन ही ये देवियांँ ही अच्छी लगती हैं, असल जिंदगी में देवी समान ये बच्चियां उनके लिए महज एक बोझ,समान लगती है।
नवरात्रों में कन्या भोज के लिए सारे बधंन टूट जाते है बस कन्या को ढूंढा जाता है कि काश किसी तरह हम कन्या पूजन करे और माँ को खुश.करे कन्या खिलाने के लिए उन्हें पैदा तो होने दें।क्यों जन्म नही लेने दिया जाता है?जब एक मासूम हैवानियत का शिकार होती है लोग तमाशा देखते है कभी कभी ऐसी घटनाएं सार्वजनिक रूप से भी घटती है तब क्यों लोगों को माँ के स्वरूप नजर नही आता है।
बेटियों को देवी सिर्फ नौ दिन के लिए नहीं जीवन भर के लिए मानकर सम्मान करें नवरात्रि के बाद यह सब भूल जाते हैं. बहुत जगह कन्याओं का शोषण होता है और उनका अपमान किया जाता है. आज भी बहुत सारे घरो में कन्या के जन्म पर दुःख मनाया जाता है. ऐसा क्यों?
क्या आप ऐसा करके देवी माँ के इन रूपों का अपमान नहीं कर रहे हैं. कन्याओं और महिलाओं के प्रति हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. देवी तुल्य कन्‍याओं का सम्मान करें।
इनका आदर करना ईश्‍वर की पूजा करने जितना पुण्‍य देता है. शास्‍त्रों में भी लिखा है कि जिस घर में औरत का सम्‍मान किया जाता है वहां भगवान खुद वास करते हैं।
वक्त के साथ हमें सोच में बदलाव की जरूरत है बेटी को भी बेटे जैसा अवसर दें तो यकिनन बेटीयाँ ही बचाएगी हमारी धरोहर, संस्कृति एवं आने वाले कल को क्योंकि वे न केवल समाज को शिक्षा देने में सबल है बल्कि देश सम्भालने की भी हिम्मत रखती है। हम सब यदि ये प्रण करें कि लिंग भेद को मिटाकर बेटे को भी ऐसे संस्कार देंगे जिससे वे बहनों का सम्मान करें, दहेज जैसी कुप्रथाओं का अंत करें, बचपन से ही बेटों को नारी के सम्मान और आदर करना सिखाएं जिससे बेटीयों के प्रति हो रही विभत्स घटनाओं का अन्त हो सके। सोचिये! यदि कन्या रुपी बेटी न होगी तो बहन नही होगी,न माँ,तो कैसे कन्या पूजन होगा।
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