युवा प्रतिभा

बचपन और चाँद

आशुतोष, कवि
पटना बिहार

नीले नभ में
चाँद चकोर
विखेरे सौन्दर्य
अनमोल
टिमटिमाते
ढेरों सितारे
टुकटुक देखे
नयन हो रहे
विभोर।
शीतलता
विखेरे चाँदनी
धरती आँचल फैला करे शोर
तरूवर की लता नाच रहे
वायु जब चले चहुँ ओर।
मुग्ध कर रही मनोरम दृश्य
उन्मुक्त हो बनी रहे सुन्दरता
आजादी की प्रवाह है
चाँद तेरी चाँदनी और शीतलता।
बादलो में जब छिपती
उदास हो
जाता हूँ मैं
पर क्या मालूम
आँख मिचोली
भी खूब सौन्दर्य बिखराती ।
देखकर तेरी
शरारत आज
बचपन की
याद दिलाती
कभी बचपन
मे इसी तरह
लुका छिपी खेली जाती।
हमारी धरती
स्वार्थो में जीवनचक्र
हर मानव में समाया
धरा की काया पर
देखो कितना मैल समाया।
विलासिता भरा युग
जबसे है आया
स्वच्छता जैसे
कालचक्र में समाया।
धरा की आभिलाषा
रखो मुझे सम्भाल
बोझ बढता ही जाता
रोज मिलता सिर्फ दिलासा।
मेरी शक्तियों को समझ
मेरे बिन जीवन कहाँ संभव
नित्य घटते वृक्ष रासायनिक उपयोग
और होते
परीक्षण से मैं अब परेशान हूँ।
मैं धरा सभी का पालनहार
पर मुझे पालने वाले
मानव, मेरा करो उद्धार
साफ सफाई हरे पौधे
ही तो मेरे श्रृंगार।
धरा नही
अस्तित्व हूँ तुम्हारी
जीवन के अंत काल में भी
विस्तर हूँ तुम्हारी
भूख की तपन को बूझाने वाली
माँ हूँ तुम्हारी।
जननी जन्मभूमि
कर्म भूमि
धरा सबसे महान
मत करो
अनादर कोई
रखो सदैव ध्यान

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