युवा प्रतिभा

डिजिटल इंसान

आशुतोष
पटना बिहार

सिलते नीयत का बोलवाला
जिधर देखो नजर आए घोटाला।
सादा जीवन नेक संदेश
सब चढ गए विलासिता को भेंट।
स्वार्थी बोल स्वार्थी भाषण
जिधर देखो मिल जाते
पार्टी कोई हो सब मिल-बाँटकर खाते।
जबसे आया
डिजिटल इंडिया
सब हैक हो जाता
जब तक पता चलता
शाॅपिंग हो जाता।
अब तो लोग भी
हैक होने लगे
मोबाइल पर बात
और मजे करने लगे।
यह कैसी धुन
सबका अपना
ही सुर।
वेरंग सा
माहौल बना
सब चिड़चिड़ा बना।
तभी तो उल्टे बोल
अपनी ही ढोलक
अपनी ही बोल।
अपना क्या है?
सब है तेरा
सामने, तू है
फिर क्यो हो अंधेरा?
फासले बढ गये
रास्ते बदल गये
छा गया अंधेरा
अपना क्या है?
सब है तेरा
सामने, तू है
फिर क्यो हो अंधेरा?
दूर बस्तियों में
है बसेरा है बसेरा
मुश्किलो का रोज
सामना मेरा
सामना मेरा
अपना क्या है?
सब है तेरा
सामने, तू है
फिर क्यो हो अंधेरा?
रास्ते अनेक है
पर मंजिल एक
फिर क्यूँ है क्यूँ है?
कटुता का डेरा
अपना क्या है?
सब है तेरा
सामने तू है
फिर क्यो हो अंधेरा?
चलते फिरते
पर बेजान लगते
कर्म और वाणियो से
निष्प्राण से लगते
स्वार्थ की भूख ने
जबसे डाला डेरा
अपना क्या है?
सब है तेरा
सामने तू है
फिर क्यो हो अंधेरा?
बिष भरा फन उठाये
चहु ओर फैले बिषैले अरमान
तिनका तिनका विखर
जाने को बेताव रहता इन्सान
अपना क्या है?
सब है तेरा
सामने तू है
फिर क्यो हो अंधेरा?

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