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ओम जय कूलर देवता

प्यारे मित्रों' शब्द से अपनी बात शुरू करने वाले जनाब अब उफ गर्मी.. आह गर्मी.. ऐ गर्मी... जैसे शब्दों से अपनी बात शुरू करने लगे थे। गर्मी आते ही उनमें कई बड़े परिवर्तन देखे जाने लगे थे।

हिसार टुडे। प्यारे मित्रों’ शब्द से अपनी बात शुरू करने वाले जनाब अब उफ गर्मी.. आह गर्मी.. ऐ गर्मी… जैसे शब्दों से अपनी बात शुरू करने लगे थे। गर्मी आते ही उनमें कई बड़े परिवर्तन देखे जाने लगे थे।
रोज सुबह उठते ही ‘ओम जय जगदीश हरे’ से भगवान को प्रसन्न करने वाले अब ‘ओम जय कूलर देवता’ की नयी प्रार्थना के साथ कूलर को प्रसन्न कर रहे थे। कूलर भी देवत्वबोध पाकर फूले नहीं समां रहा था। पूरे साल धूल के बीच दम घोंटने वाला कूलर अब रोज नहलाया चमकाया जा रहा था। कूलर के अच्छे दिन आ गये थे।
उसके प्रति सैकड़ों भक्तों की श्रद्धा अचानक से बढ़ने लगी थी। कूलर ने भी सही मौका देखा और अपने भाव में पेट्रोल और डीजल के उछलते भाव जैसी वृद्धि कर डाली। जल्दी से शुरू होना वाला कूलर अब बहुत देर से शुरू होने लगा। जब तक भक्त उसके आगे घुटने न टेक देता तब तक वह शुरू होने का नाम नहीं लेता।
भीषण गर्मी में पसीने से तरबतर होने वाले मध्यमवर्गीय भक्तों के पास कूलर की चरण वंदना करने के सिवाय और कोई दूजा विकल्प भी नहीं था। पंखे के परखच्चे उड़ गये थे। हाथ पंखा हाथों का दर्द बढ़ाने पर आमादा था। इसलिए कूलर ही प्राणरक्षक नजर आ रहा था।
गर्मी के साथ लू के रूप में चलने वाली गर्म हवाओं से कई कलियां मुरझा गयीं। सूरज ने आग बरसानी शुरू की तो भक्तों ने भी ओम सूर्याय नमः के मंत्रोच्चार के साथ दादा को जल अर्पण करना बंद कर दिया। भक्त अर्पण का जल गर्मी के मारे खुद ही गटकने लगे।
सूरज पर गीत कविता लिखने वाले रचनाधर्मी अब उससे आंखें चूराने लगें। सूरज के पलकें खोलने से पहले ही भक्तों को सूरज के मद्धम होने और पवन के चलने का इंतजार रहने लगा। गर्मी ने दोपहर की वैल्यू डाउन की और संध्या को सुंदरी के खिताब से नवाजा। सूरज ने खुद जलकर कई लोगों की इज्जत में चार चांद लगा दिये।
कूलर को अपना प्रतिष्ठित जीवन लौटाया, बरसात और बादलों के प्रति लोकमानस में श्रद्धा का भाव जगाया। जल की कीमत समझायी और ठंड से लेकर ठंडाई के प्रेम में इजाफा किया।
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