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हमारी स्त्री शक्ति के लिए सबसे बड़ा शत्रु इज्जत की अवधारणा है

                                          डॉ शिरीष पाठक लेखक

Hisar News

हमारी स्त्रीशक्ति के लिए सबसे बड़ा शत्रु ‘इज्जत की अवधारणा’ है, जिसे हमारे दिशाहीन भ्रष्ट समाज ने अपनी पतनशीलता के अनुपात में गढ़ा है। अच्छे मानवीय सामाजिक कामों से धीरे-धीरे बड़ी मेहनत से ‘इज्जत’ कमायी जाती है फिर यह सहसा लड़की के दुपट्टे के जरा सा फिसल जाने से कैसे खतरे में आ जाती है? अमानवीय असामाजिक कामों से इज्जत को खतरा होना चाहिए था फिर यह ‘कपड़ों’ में कैसे समाती चली गई? और फिर धीरे धीरे इज्जत का सारा दारोमदार केवल स्त्री पर कैसे आ गया? एक स्त्री तलवार की तरह बलात्कारी का सामना कर सकती है, लेकिन वह अपने कपडे भी बचाती रह जाती है क्योंकि हम भेड़ियों ने स्त्री शरीर को ही इज्जत बना दिया है। स्त्री शील की अवधारणा भी एक दूसरी गहरी साजिश है। रनिवास और हरम के इतिहास वाले देश जब स्त्री शील खोजते हैं तो यह अश्लीलता की हद होती है। हमारी शिक्षा केवल कुत्सित भोग की कुत्सित सामाजिकता की ओर ले जा रही। इतिहास, दर्शन, साहित्य, राजनीति, कला की शिक्षा को अपने दैनंदिन जीवन का अंग बनाइए नहीं तो बहुत जल्द हम ‘रोबो सेपीयंस’ बनकर रह जाएंगे जिसके लिए जिंदगी महज सिल्वरस्क्रीन बनकर रह जाएगी।

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