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सिरसा में कांग्रेस रख पाएगी बादशाहत बरकरार या भाजपा लगाएगी नजर!

इनेलो के उम्मीदवार पर जजपा की नजर, दुग्गल और बेदी भाजपा के उम्मीदवारों की सूची में सबसे आगे

Hisar Today

टुडे न्यूज | हिसार
हरियाणा की कुल 10 लोकसभा सीटो में से जो दो सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित की गई हैं, उनमें से एक सिरसा की सीट भी है। यूं तो सिरसा लोकसभा सीट जाट बहुल मतदाताओं वाली सीट है, लेकिन विशेष दर्जे की वजह से कभी भी कोई जाट यहां से चुनाव नहीं लड़ पाया है। वैसे इस सीट का गठन 1962 में हुआ था।

साल 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनावों से लेकर 1961 तक इस सीट का कोई अस्तित्व नहीं था। यह सीट शुरू में ही आरक्षित कर दी गई थी और तभी से इसका आरक्षित दर्जा बदस्तूर जारी है। गौरतलब है कि सिरसा लोकसभा सीट पर ज्यादातर कांग्रेस के उम्मीदवार का ही दबदबा रहा है। जबकि भाजपा को इस सीट पर आज तक कभी भी जीत का स्वाद चखने का मौका नहीं मिला है।

मुख्य विपक्षी दल इनेलो को यहां 1989, 1998, 1999 व 2014 में विजय का सेहरा बंधवाने का मौका मिला, लेकिन 1989 व 1999 में तो उसे जीत तब मिली थी जब उसका भाजपा के साथ गठबंधन था, जबकि 1998 मे इनलो ने बसपा के साथ समझैता कर जीत का परचम फहराया था। खुद के बलबूते पर जीत इनेलो को भी सिर्फ 2014 में ही नसीब हुई।

हालांकि इस बार खुद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने हरियाणा के दौरे में अपने सभी पार्टी कार्यकर्ताओं को चेता दिया है कि किसी भी हाल में सिरसा लोकसभा सीट भाजपा के खाते में लाने के लिए कार्यकर्ता जी जान एक कर दें। ऐसे में भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की हो गयी है।

2019 के लोकसभा चुनाव की अगर बात करें तो सिरसा सीट पर भाजपा का कड़ा मुकाबला इनेलो और कांग्रेस के बीच होना तय है। राज्य की सत्ता में भाजपा विराजमान है और उसकी शक्ति 2014 के मुकाबले बहुत ज्यादा हो गयी है, इसलिए 2019 में वो इस सीट पर पहली बार कामयाबी हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकर झोंक देगी।

सिरसा का इतिहास प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है। सिरसा शहर का धर्म, राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है। देश में सबसे अधिक गौशालाएं सिरसा में हैं। कृषि के क्षेत्र में भी सिरसा का नाम आता है, कपास उत्पादन में सिरसा का अहम स्थान है, जहां तक राजनीति की बात करें तो सिरसा लोकसभा सीट गठन के बाद से ही सुरक्षित है और ज्यादातर इस पर कांग्रेस का कब्जा रहा है।

कांग्रेस की तरफ से अशोक तंवर ठोक रहे ताल
जैसे की यह सभी जानते हैं कि सिरसा लोकसभा सीट में हमेशा से ही कांग्रेस का दबदबा रहा है इसलिए पिछले बार सत्ता से बाहर कांग्रेस इस बार अपनी बादशाहत बरकरार रखने में कोई को कसर नहीं छोड़ेगी। 1991 के मध्यावधि आम चुनावों में दिग्गज कांग्रेसी नेता चौधरी दलबीर सिंह की बेटी कुमारी शैलजा ने यहां पर जनता पार्टी के हेतराम को हराकर कांग्रेस की जीत का परचम लहराया था, जबकि दूसरी बार 1996 में भी कुमारी शैलजा ने समता पार्टी के डा. सुशील इंदौरा को हराकर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाली थी। लेकिन 1998 में इनेलो बसपा गठबंधन के डा. सुशील इंदौरा ने कांग्रेस की कुमारी शैलजा को हराकर यह सीट छीन ली। लेकिन 2004 में कांग्रेस ने फिर बाजी पलट दी और उसके आत्मा सिंह गिल ने इनेलो के सुशील इंदौरा को परास्त कर यह सीट जीत ली। कांग्रेस ने 2009 के चुनावों में पहली बार एक बनाये चेहरे को उतारा था वो थे कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ .अशोक तंवर। कांग्रेस पार्टी आलाकमान के विश्वास पर खरे उतारते हुए उस दौरान अशोक तंवर ने जीत हासिल की थी, मगर 2014 का चुनाव उनके लिए निराशजनक रहा। क्योंकि उस दौरान इनेलो के रोड़ी 5,06,370 वोट लेकर पहले स्थान पर रहे, जबकि अशोक तंवर 3,90,634 मत लेकर 1,15,736 मतों के अंतर से परास्त हो गये। मगर अशोक तंवर ने हिम्मत नहीं हारी वो गत साढ़े चार सालों से पूरी तरह से एक्टिव मोड़ में है। इसलिए इस बार भी सिरसा की इस प्रतिष्ठित लोकसभा सीट पर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ अशोक तंवर दुबारा से अपनी मजबूत ताल ठोक रहे है।

भाजपा से सुनीता दुग्गल और कृष्ण बेदी के नाम की चल रही चर्चा
सिरसा लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी अभी तक अपना मुंह मीठा करने का इनतजार कर रही है। मगर भाजपा नेताओं को विश्वास है कि इस बार भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ वरिष्ठ नेताओं का यहां से जरूर मुंह मीठा होगा। हालांकि पार्टी कुछ भी सोच ले, मगर यह तभी मुमकिन होगा जब भाजपा यहां से किसी मजबूत और प्रबल उम्मीदवार को चुनावी मैदान पर उतारती है। सूत्रों का मानना है कि भाजपा किसी सशक्त उम्मीदवार को यहां से दावेदारी देने के प्रयास में है। फिलहाल इस मजबूत सीट से मैदान में उतारने के लिए भाजपा के पास कुछ उम्मीदवार कतार में हैं उनमें शामिल हंै राजयमंत्री कृष्ण बेदी और हरियाणा अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम की चेयरपर्सन सुनीता दुग्गल। बता दें कि सुनीता दुग्गल पुलिस अधीक्षक राजेश दुग्गल की धर्मपत्नी है और हरियाणा सरकार ने भारतीय राजस्व सेवा की अधिकारी भी रह चुकी है। वैसे अगर इन नामों के साथ भाजपा चुनाव में उतरती है तो उसे काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है।

इनेलो चरणजीत सिंह रोड़ी पर खेल सकती है दांव
बता दें कि इनेलो ने जाट बहुल इस सीट पर जीत के साथ अपनी अच्छी खासी पैठ जमाई है। हालांकि इनेलो के पास चरणजीत सिंह रोड़ी के अलावा किसी दूसरे नाम की चर्चा नहीं है। मगर कहा जाता है कि ओमप्रकाश चौटाला ने निष्ठावान चरणजीत सिंह रोड़ी अजय चौटाला के भी बेहद नजदीकी माने जातें है। कई बार उनकी अजय चौटाला से मुलाक़ात भी हो चुकी है। ऐसे में जब जजपा ने नई पार्टी के गठन के लिए जींद में विशाल रैली आयोजित की थी तब यह माना जा रहा था कि रोड़ी उस सभा में जाएंगे, मगर वो नहीं गए। तभी से ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि रोड़ी जजपा में शामिल हो जाएंगे, मगर ऐसा हो न सका। इनेलो के वरिष्ठ नेताओं को जहां इस बात का डर सताये जा रहा है कि रोड़ी चुनाव नजदीक आते ही दल बदल न कर ले, वहीं जजपा सिरसा सीट पर कोई पत्ते नहीं खोलना चाहती वो यही चाहती है कि रोड़ी उनके खेमे में आ जाए और वह मजबूती से सभी पार्टी को टक्कर दे। खैर देखना है कि उनका यह इंतज़ार कितना पूरा होता है।

सामाजिक ताना-बाना
जातीय समीकरणों के हिसाब से सिरसा में सबसे ज्यादा जाट वोटर्स करीब 3,30,000 हैं। उसके बाद करीब 1,78,000 सिख मतदाता हैं। तीसरे नंबर अनुसूचित जाति के वोटर्स हैं। सिरसा (सुरक्षित) लोकसभा क्षेत्र की एक खास बात यह है कि यह तीन जिलों सिरसा, फतेहाबाद और जींद तक फैली हुई है। इनमें से छह विधानसभा क्षेत्र -रतिया, कालांवाली, डबवाली, सिरसा, रानियां और ऐलनाबाद तो सिरसा जिले के अंतर्गत ही आते हैं, जबकि टोहाना व फतेहाबाद की दो सीटें जिला फतेहाबाद में पड़ती हैं। नौंवी सीट नरवाना की है, जो कि जिला जींद का हिस्सा है, लेकिन लोकसभा में सिरसा के साथ जुड़ी हुई है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि
सिरसा लोकसभा सीट का गठन 1962 को हुआ था, तब से इस सीट पर भाजपा को कभी कामयाबी नहीं मिली है। हालांकि कहा जाता है कि इस सुरक्षित सीट को लेकर भाजपा कभी गंभीर नहीं दिखाई दी, इसलिए 2014 में भाजपा ने गठबंधन के बाद इस सीट को हजकां के लिए छोड़ दिया था। सिरसा लोकसभा सीट पर ज्यादातर कांग्रेस के उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। 1962 से अब तक इस सीट पर कांग्रेस को 9 बार जीत मिली है, जबकि इनेलो को यहां 1989, 1998, 1999 और 2014 में विजय का सेहरा बंधवाने का मौका मिला था। सिरसा लोकसभा सीट की खासियत यह है कि यह तीन जिले सिरसा, फतेहाबाद और जींद तक फैली है।

2014 का जनादेश
पिछले लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के चरणजीत सिंह रोड़ी ने 1,15,736 वोटों से जीत हासिल की थी। चरणजीत सिंह को 39.59 फीसदी वोट के साथ 5,06,370 में मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के अशोक तंवर को 30.54 फीसद वोट के साथ कुल 3,90,370 वोट पड़े थे। भाजपा समर्थिक हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) के डॉ. सुशील इंडोरा को 2,41,067 वोट प्राप्त हुए थे।

सिरसा का इतिहास
1819 में सिरसा शहर को ब्रिटिश शासक ने अपने कब्जे में ले लिया था। बाद में इसे दिल्ली क्षेत्र के उ‍तरी-पश्चिमी जिले का एक हिस्सा बना दिया था। सन् 1837 में अंग्रेजों ने भटियाणा जिला बनाकर सिरसा को उसका मुख्यालय बना दिया था। लेकिन 1857 में अंग्रेजों को यहां से खदेड़ दिया गया। सिरसा शहर मोहम्मद गजनवी के आक्रमणों का भी शिकार हुआ था। सरस्वती नदी के तट पर बसा होने के कारण पहले सिरसा का नाम सरस्वती नगर था।

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