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लोकसभा चुनाव में 5 परिवारों की ‘विरासत’ लगी दांव पर!

किरण की ताकत बढ़ने का एकमात्र सहारा श्रुति की जीत > हिसार से ज्यादा रोचक रहेगा रोहतक और सोनीपत

हुड्डा का दुर्ग ढ़हा तो वापसी मुश्किल
राजतीतिक संन्यास से पहले बृजेन्द्र क्या संभाल पाएंगे बीरेंद्र सिंह की विरासत
कुलदीप के बाद भव्य बिश्नोई संभालेंगे भजनलाल की विरासत
 इनेलो और जननायक जनता पार्टी में से किसे मिली स्वीकारिता, जनता करेगी तय
महेश मेहता | हिसार
कहते हैं समय केे साथ बदलाव प्रकृति का नियम है। हरियाणा का इतिहास भी इस बदलते समय का गवाह रहा है। अक्सर हरियाणा कि राजनीति ताऊ देवीलाल, स्वर्गीय भजनलाल, स्वर्गीय बंसीलाल और हुड्डा के इर्द गिर्द घूमती नजर आई।
मगर इसबार चुनाव में यह जंग और अस्तित्व की लड़ाई कुल 5 खानदानो के बीच है। पहली जंग है ताऊ देवीलाल के नाम से मशहूर चौटाला परिवार, दूसरी स्वर्गीय भजनलाल, तीसरी स्वर्गीय बंसीलाल, चौथी हुड्डा परिवार और पांचवी चौधरी बीरेंद्र सिंह की।
इस बार के चुनाव में आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि क्या इस बार हरियाणा की आम जनता ने जातिगत फैक्टर को सिरे से नकारा है और क्या इस बार इन 5 खानदानो की राजनीतिक विरासत खतरे में है। आखिर क्यों जरुरी हो गया है इन पांचो खानदानो को इस बार लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रद्रशन कर सीट जीतना।
क्योंकि वह जानते हैं कि अगर ऐसा ही माहौल हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब उनका राजनीतिक करिअर खतरे में पड़ जायेगा, बल्कि आने वाले समय में उनके लिए भाजपा से टक्कर लेना भी और कठिन हो जायेगा। कितना महत्वपूर्ण है यह चुनाव उनके लिए आइये जानते हैं।

ताऊ देवीलाल की विरासत होगी किसकी यह फैसला होगा 23 मई को

ताऊ देवीलाल का जब भी नाम लिया जाए तो याद आती है इनेलो पार्टी। मगर लोकसभा चुनाव को पहले इनेलो की दो फाड़ हो जाने के बाद एक तरफ अभय चौटाला की पार्टी इनेलो खड़ी है और दूसरी तरफ अजय चौटाला की पार्टी जननायक जनता पार्टी खड़ी है।
ऐसे में ताऊ देवीलाल के विचारधारा की कौन सी पार्टी आगे चल रही है और हरियाणा की जनता इन दोनों पार्टियों में से किसे ज्यादा स्वीकार करती है उसका फैसला इस लोकसभा चुनाव में हो जाएगा। इस चुनाव में न केवल इनेलो का राजनीतिक भविष्य का आकलन होगा, बल्कि जननायक जनता पार्टी के राजनीतिक भविष्य की चुनौतियों का भी फैसला होगा। साथ ही यह तय होगा कि आने वाले समय में क्या उनकी पार्टी जनता की कसौटी पर खरी उतरेगी या उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।
बता दें कि इस बार चौटाला परिवार के सभी तीसरी पीढ़ी अर्थात दुष्यंत चौटाला हिसार से, उनके भाई दिग्विजय चौटाला सोनीपत से और अभय चौटाला के बेटे अर्जुन चौटाला कुरुक्षेत्र की धरती से चुनावी मैदान में उतरे हंै और आने वाले नतीजे भी तय करेंगे कि आगे उनके राजनितिक भविष्य क्या होगा? और उनके समक्ष कितनी चुनौतियां है।
अगर इस चुनाव में जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला चुनाव जीतने में कामयाब होते हैं तो न केवल जननायक जनता पार्टी को ताऊ देवीलाल की विचारधारा वाली पार्टी में गिना जाएगा, बल्कि इसका बहुत बड़ा असर आगामी विधानसभा चुनाव में पड़ता दिखाई देगा।
इतना ही नहीं इनेलो पार्टी का अगर वोट बैंक घटता हुआ दिखाई दिया तो अभय चौटाला के सामने आगामी विधानसभा चुनाव में न केवल पार्टी को बचाना मुश्किल हो सकता है बल्कि विधानसभा चुनाव में सीट जीतना भी मुश्किल हो जाएगा।

हुड्डा का गढ़ गया तो भाजपा को मिलेगी बड़ी कामयाबी इस बार भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे कठिन

चुनाव हिसार से ज्यादा रोहतक और सोनीपत लोकसभा चुनाव रहा। क्योंकि जाट बेल्ट के नाम से मशहूर इस लोकसभा सीटों में एक तरफ रोहतक से दीपेंद्र हुड्डा मैदान में थे तो ठीक दूसरी तरफ सोनीपत से उनके पिता और हरियाणा में 2 बार मुख्यमंत्री रहे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा मैदान में थे। यह दोनों संसदीय क्षेत्र ही ऐसे है जहां भाजपा को सबसे ज्यादा नुक्सान और चुनाव जीतना मुश्किल रहा है।
यह दोनों गढ़ ही भाजपा का गणित बिगाड़ने में हमेशा सफल रहे हैं। इसीलिए इस बार इन दोनों ही सीटों में जाट और नॉन जाट का मुद्दा हावी रहा। हुड्डा भी यह जानते हैं कि रोहतक में भाजपा की एंट्री से न केवल रोहतक का उनका गढ़ हिल जायेगा, बल्कि दुबारा वापसी उनके लिए मुश्किल भी साबित हो सकती है, मगर अगर भाजपा यहां से जीतने में कामयाब रही तो दुबारा हुड्डा परिवार के लिए इस सीट से वापसी करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए दीपेंद्र हुड्डा और भूपेंद्र हुड्डा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

चौ. बीरेंद्र सिंह के रिटायर्ड होने के पहले बेटे की राजनीतिक एंट्री का सपना

इस चुनाव में राजनीति के सबसे पुराने खिलाड़ियों में से एक चौधरी बीरेंद्र सिंह के लिए भी हरियाणा लोकसभा का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस बार उनके बेटे बृजेन्द्र सिंह का राजनीतिक भविष्य इस चुनाव में टिका हुआ है। इस चुनाव में सर छोटू राम की विरासत को आगे ले जाते चौधरी बीरेंद्र सिंह तो खुद ही कह चुके हैं कि वह राजनीति से रिटायर्ड हो चुके हैं, ऐसे में इस राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी हिसार लोकसभा से भाजपा प्रत्याशी बृजेन्द्र सिंह के कंधो पर आ चूकी है।
इसलिए इस चुनाव में मोदी लहर में जीत का खवाब देख खुद चौधरी बीरेंद्र सिंह ने प्रचार का दायित्व अपने हाथों में उठाया। अगर बृजेन्द्र सिंह हिसार से सीट निकालने में कामयाब रहे तो ठीक, वरना बीरेंद्र सिंह को अपने बेटे के लिए विधानसभा या 5 साल बाद दुबारा लोकसभा चुनाव का इंतजार करना पड़ेगा।

हुड्डा का गढ़ गया तो भाजपा को मिलेगी बड़ी कामयाबी इस बार भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे कठिन

चुनाव हिसार से ज्यादा रोहतक और सोनीपत लोकसभा चुनाव रहा। क्योंकि जाट बेल्ट के नाम से मशहूर इस लोकसभा सीटों में एक तरफ रोहतक से दीपेंद्र हुड्डा मैदान में थे तो ठीक दूसरी तरफ सोनीपत से उनके पिता और हरियाणा में 2 बार मुख्यमंत्री रहे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा मैदान में थे।
यह दोनों संसदीय क्षेत्र ही ऐसे है जहां भाजपा को सबसे ज्यादा नुक्सान और चुनाव जीतना मुश्किल रहा है। यह दोनों गढ़ ही भाजपा का गणित बिगाड़ने में हमेशा सफल रहे हैं। इसीलिए इस बार इन दोनों ही सीटों में जाट और नॉन जाट का मुद्दा हावी रहा।
हुड्डा भी यह जानते हैं कि रोहतक में भाजपा की एंट्री से न केवल रोहतक का उनका गढ़ हिल जायेगा, बल्कि दुबारा वापसी उनके लिए मुश्किल भी साबित हो सकती है, मगर अगर भाजपा यहां से जीतने में कामयाब रही तो दुबारा हुड्डा परिवार के लिए इस सीट से वापसी करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए दीपेंद्र हुड्डा और भूपेंद्र हुड्डा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

स्व. भजनलाल की विरासत “भव्य” पर कितनी होगी मेहरबान!

स्वर्गीय भजनलाल के बारे में हरियाणा की जनता भली भांति वाकिफ है, मगर इस बार चौधरी भजनलाल परिवार की तीसरी पीढ़ी अर्थात उनके पोते भव्य बिश्नोई चुनावी रणसंग्राम में उतरे। इतना ही नहीं परिवार से ही कुलदीप बिश्नोई जहां आदमपुर तो वहीं उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई हांसी से विधायक रही है।
ऐसे में इस चुनाव में अगर भजनलाल के पोते चुनाव में अच्छे मत लाने में कामयाब हुए तो हो सकता है कि आगामी राजनीति में उनका स्टार जमकर चमकेगा। इतना ही नहीं विधासभा चुनाव में भी कुलदीप बिश्नोई के आदमपुर के गढ़ से उन्हें कोई नहीं हटा पायेगा। हालांकि रेणुका बिश्नोई के सामने चुनौती होगी कि वह हांसी में अपना दबदबा बना कर रख सके। हालांकि यह चुनावी नतीजे तय करेंगे हरियाणा की राजनीति में भजनलाल परिवार का राजनीतिक भविष्य।

श्रुति की जीत के साथ बंसीलाल परिवार की राजनीति में मजबूती का किरण देख रही सपना

बता दें कि स्वर्गीय बंसीलाल और पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की विरासत को आगे ले जाने का काम अब तक मात्र किरण चौधरी करते आ रही है, मगर इस बार उन्होंने दुबारा भिवानी-महेंद्रगढ़ से अपनी बेटी श्रुति चौधरी को मैदान में उतार कर अपनी राजनीतिक विरासत को मजबूत करने का काम किया है।
इसलिए अगर श्रुति चौधरी यहां से चुनाव में जितने में कामयाब रही तो न केवल किरण चौधरी की राजनीतिक ताकत को और बढ़ाने का काम करेगा। बल्कि स्वर्गीय बंसीलाल की राजीतिक विरासत को दमदार तरीके से आगे ले जाने में मदद करेगा।
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