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राहुल गांधी – प्रियंका गांधी की जोड़ी करेगी 2019 में कमाल!

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को जब से पार्टी की कमान मिली है, तब से वह कांग्रेस को राजनीति में दुबारा एंट्री पाने के लिए फ्रंट फुट पर आकर हर दांव खेल रहे है कि अब इससे भाजपा के मंत्रियों के पसीने छूटने लगे है कि आखिर राहुल के दिन ब दिन इस बढ़ते कद को कैसे रोका जाए। कहा जाता है भाजपा को धोबी पछाड़ करने के लिए राहुल इन दिनों ऐसे ऐसे निर्णय ले रहे है जैसे किसी ने भी नहीं सोचा हो। इसी का जीता जागता उदाहरण जींद उपचुनाव को लेकर भी देखा जा सकता है. वहां भाजपा को हारने के लिए राहुल गांधी ने अपने विश्वासपात्र रणदीप सुरजेवाला को खड़ा कर जींद उपचुनाव को रोचक बना दिया। इनदिनों किसी न किसी प्रकार का मास्टरस्ट्रोक खेलने वाले राहुल ने हाल में एक ऐसा दांव खेला जिसकी जानकारी खुद उनके पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को नहीं थी।
जी हां यहां मैं बात कर रही हु प्रियंका गांधी कि जिन्होंने आखिरकार ना-ना करते-करते हां आखिरकार कर ही दी। अब वे आधिकारिक तौर पर राजनीति में आ गई हैं और कांग्रेस की महासचिव बनाई गई हैं। राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का जिम्मा सौंपा है। उत्तर प्रदेश एक जमाने में कांग्रेस का अच्छा ख़ास प्रभाव था, मगर कमजोर होती कांग्रेस की पकड़ को जिन्दा करने और यहां कांग्रेस के लिए संजीवनी प्रदान करने का जिम्मा प्रियंका को सौंपा गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 34 सीटें आती हैं जिनमें से करीब 16 सीटें ऐसी हैं जहां यदि ब्राह्मण और मुस्लिम एक साथ आ जांए तो पासा पलटा जा सकता है।
वैसे भी प्रियंका राजनीति के लिए नई तो हैं नहीं। एक बार उन्होंने मुझे निजी बातचीत में बताया था कि वे हमेशा से दादी की ही बेटी रही हैं और उन्हीं की तरह बनना चाहती थीं। मगर 12 साल की उम्र में दादी ने उसे अकेले कर दिया और बाद में पिता राजीव गांधी का भी साया सिर से उठ गया। जीवन में घटे इन पलों ने प्रियंका को समय से पहले परिपक्व बना दिया। अब उसने अपने आप को मां सोनिया गांधी के लिए ढाल बना दिया। एक इंटरव्यू में प्रियंका ने कहा था कि जब 2004 में कांग्रेस बहुमत में आई और सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सहयोगी दलों ने दबाव बनाना शुरू किया तो प्रियंका ने राहुल के साथ मिलकर ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने सोनिया गांधी को मनाया कि यदि वे प्रधानमंत्री बनती हैं तो उनकी जान को खतरा हो सकता है और वे किसी भी हालत में ऐसा नहीं होने देना चाहती हैं। इतिहास गवाह है कि मनमोहन भारत के प्रधानमंत्री बने और दस साल तक अपने पद पर बने रहे। उधर प्रियंका का राजनीति से नाता बना रहा, एक तरह से रायबरेली और अमेठी के केयर टेकर के रूप में। वे सोनिया गांधी के लोकसभा क्षेत्र की देखभाल करने का काम करने लगीं। वहां से जो भी जनता दिल्ली आती थी उसे प्रियंका से ही मिलना पड़ता था। वही उनकी समस्याओं को देखती थी।
अब जब राहुल गांधी ने अपनी छोटी बहन को पूर्वी उत्तर प्रदेश का जिम्मा सौंपा है तो प्रियंका के लिए उतनी मुश्किल नहीं होने वाली है। क्योंकि ये वह इलाका है जो एक वक्त में कांग्रेस को वोट बैंक हुआ करता रहा है। मगर प्रियंका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कांग्रेस के लिए एक ढांचा तैयार करना। प्रियंका के पास अपील तो है, लोग उन्हें देखना और सुनना पसंद करते हैं, मगर क्या वह वोट में तब्दील हो पाएगा, ये सबसे बड़ा सवाल है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बाद कांग्रेस के लिए कितना वोट बचेगा ये सबसे बड़ा सवाल है। सर्वे की मानें तो यदि कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन का हिस्सा होती तो बीजेपी 20 सीटों तक सिमट सकती थी, मगर ऐसा हो न सका और राहुल ने उत्तरप्रदेश के एक हिस्से को प्रियंका और दूसरे को ज्योतिरादित्य सिंधिया के हवाले कर दिया। दोनों के पास काम बहुत कठिन है मगर नामुमकिन नहीं है। यानी 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए खेल अभी खुला हुआ है।
कहते हैं न कि पिक्चर अभी बाकी है दोस्त। मजा तो तब आएगा जब प्रियंका पूर्वी उत्तरप्रदेश के दौरे पर निकलेंगी। इतना तो तय है कि मीडिया में उन्हें जबरदस्त कवरेज तो मिलेगा ही साथ ही लोगों को एक नई आवाज सुनने को भी मिलेगी। नतीजा चाहे जो भी हो मगर प्रियंका को उत्तरप्रदेश में आगे कर राहुल ने यह तो दिखा ही दिया है कि वे इस प्रदेश को लेकर गंभीर हैं और आगे की राजनीति के लिए भी तैयार हैं। राहुल ने प्रियंका को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है और केन्द्र में गठबंधन की सरकार बनने की भी बात कही है।
सूत्रों की मानें तो प्रियंका गांधी 2019 का लोकसभा चुनाव भी रायबरेली से लड़ेंगी। ऐसे में कांग्रेस भले ही उत्तर प्रदेश में हासिए पर दिखे मगर चुनाव तो दिलचस्प बन गया है। यानी अगला चुनाव भाई-बहन की जोड़ी बनाम मोदी-शाह की जोड़ी के बीच ही लड़ा जाएगा। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने सपा और बसपा के प्रति नरम रुख दिखाकर उस तरफ के दरवाजे भी बंद नहीं किए हैं। वैसे भी सपा-बसपा ने अमेठी और रायबरेली से उम्मीदवार खड़े न करके एक तरह से राहुल और प्रियंका के लिए पूरे प्रदेश में प्रचार करने के लिए ज्यादा अवसर देने की बात कही है। सही ही है सभी को पता है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता बिहार और उत्तर प्रदेश से होकर ही गुजरता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि एक और गांधी जो दूसरी पार्टी में हैं उनका भी कांग्रेस में आना हो सकता है क्योंकि वे गांधी प्रियंका से काफी नजदीक बताए जा रहे हैं। ऐसे में लगता है कि राहुल के तरकश में अभी और भी तीर बाकी हैं।
अब सवाल यह भी उठा खड़ा होता है कि क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी का नया ब्रह्मास्त्र बनकर सामने आएंगी। राहुल गांधी का अपनी बहन प्रियंका गांधी को महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी देने से कार्यकर्ताओं में उत्साह हो सकता है, वो यह भी सोच सकते हैं कि यह फ़ैसला एक गेम चेंजर है। लेकिन वास्तव में पार्टी की राजनीति का नेतृत्व एक बार फिर उस परिवार के पास पहुंच गया है, जिसके इर्द गिर्द कांग्रेस ने खुद को लंबे वक़्त से बनाए रखा है। 1960 के दशक में नेहरू और इंदिरा (पिता-पुत्री), फिर 1970 के दशक में इंदिरा-संजय (मां-छोटे बेटे) और 1980 के दशक में इंदिरा-राजीव (मां-बड़े बेटे) . गांधी परिवार के बाहर से पहली बार किसी ने कांग्रेस को चलाया तो वो थे पीवी नरसिम्हा राव। उन्होंने 1996 तक कांग्रेस पार्टी और इसकी सरकार चलाई।
लेकिन 1998 में कांग्रेस के विभाजन के बाद पार्टी की खस्ता हालत को देखते हुए सोनिया गांधी को कांग्रेस की मदद के लिए आगे आना पड़ा। 1996 से 1998 तक कांग्रेस के प्रमुख रहे गांधी परिवार के वफादार सीताराम केसरी पार्टी को साथ नहीं बांध सके थे। सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान इसलिए संभाली क्योंकि उनके परिवार के बिना पार्टी डूब रही थी और पार्टी के बिना उनके परिवार की श्रेष्ठता और प्रासंगिकता ख़तरे में थी। यहां से, सोनिया गांधी ने 2004 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस को अखण्ड रखने में कामयाबी पाई, तब वाजपेयी सरकार ने सत्ता गंवा दी थी।
इसके बाद अगला 10 साल सोनिया-राहुल (मां-बेटे) का स्वर्णिम काल रहा। लेकिन फिर 2014 में भाजपा के नए स्टार नरेंद्र मोदी से कांग्रेस बुरी तरह हार गई। पार्टी को सत्ता का नुकसान काफी हद तक बड़े बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार के कारण हुआ, इसने पार्टी की छवि को बुरी तरह धूमिल कर दिया। तब से, सोनिया-राहुल की जोड़ी ने खुद को मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की चुनौतियों के सामने अपर्याप्त पाया। हालांकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की चुनावी सफलता पार्टी के खुश होने के लिए पर्याप्त कारण ज़रूर हैं। इसी सफलता को देखते हुए अब कांग्रेस के लिए बहुत कठिन 2019 लोकसभा चुनाव से पहले गांधी परिवार ने मां-बेटे की जोड़ी की जगह सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी को आजमाने का फ़ैसला किया है।
हम केवल यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि देश ने चुनाव से पहले सामंती वंशवादी राजनीति के एक नए अवतार को देखा है और इससे गांधी परिवार के साथ साथ कांग्रेस पार्टी का भी बनना या बिगड़ना तय है.क्यों किया प्रियंका को उतारने का फ़ैसला ? इस महीने की शुरुआत में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की घोषणा से कांग्रेस पार्टी एक बार फिर संकट में है। उत्तर प्रदेश की इन पार्टियों ने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी को नज़रअंदाज किया। सपा और बसपा से मिले इस सबक से कांग्रेस ने शुरुआत में उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा की लेकिन फिर इसने कहा कि वो अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन के लिए तैयार है। गांधी परिवार ने ‘प्रभुत्व के सिद्धांत’ के अनुसार आम कार्यकर्ताओं के सामने ‘पारम्परिक प्रभुत्व’ को ला खड़ा किया है।

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