टुडे न्यूज़ताजा खबरसंपादकीयहरियाणा

राजनीतिक पंडितों को “एग्जिट पोल” पर भरोसा नहीं !

चुनाव 2019

अर्चना त्रिपाठी | हिसार
विभिन्न सर्वेक्षण कंपनियों और न्यूज चैनल्स की ओर से कराए गए एग्जिट पोल में एनडीए सरकार की वापसी का रास्ता साफ दिखाया जा रहा है।
लेकिन विपक्षी पार्टियों के अलावा राजनीतिक विश्लेषकों को भी ये विश्लेषण वास्तविकता से परे नजर आ रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों और लोकसभा चुनावों के एग्जिट पोल भी वास्तविकता से काफी दूर रहे हैं इसलिए इस बार ये कितने सही होंगे, इस पर विश्वास करना मुश्किल है।
लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के राजनीतिक संपादक सुभाष मिश्र कहते हैं कि ज़मीन पर जो भी रुझान देखने को मिले हैं उन्हें देखते हुए सीटों की ये संख्या कतई वास्तविक नहीं लग रही है।
वो कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में जिस तरीके की जातीय और क्षेत्रीय विविधता है, मतदान के तरीकों और रुझानों में जितनी विषमता है, उनके आधार पर इस तरह से सीटों का सही अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल होता है। ज्यादातर एग्जिट पोल बीजेपी के पक्ष में एकतरफा नतीजा दिखा रहे हैं, जो संभव नहीं लगता है। जितना मैंने यूपी में जमीन पर देखा और समझा है, उसके अनुसार कह सकता हूं कि गठबंधन अच्छा करेगा।”
हालांकि कुछ एग्जिट में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को उत्तर प्रदेश में काफी आगे दिखाया गया है लेकिन ज्यादातर में या तो बीजेपी के साथ उसका कड़ा संघर्ष देखने को मिल रहा है या फिर बीजेपी को काफी आगे दिखाया जा रहा है।
सुभाष मिश्र कहते हैं कि हाल ही में तीन राज्यों में जो चुनाव हुए थे, ज्यादातर एग्जिट पोल वहां भी सही नहीं निकले, इसलिए बहुत ज्यादा भरोसा करना ठीक नहीं है। यही नहीं, ज्यादातर विश्लेषक खुद एग्जिट पोल्स के बीच आ रही विविधता की वजह को भी इनकी प्रक्रिया और इनके परिणाम पर संदेह का कारण मानते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा अब तक कई चुनावों को कवर कर चुकी हैं। वो कहती हैं, “ एग्जिट पोल शुरू में जो आते थे, वो सत्यता के काफी करीब होते थे। उसकी वजह ये थी कि उनमें उन प्रक्रियाओं का काफी हद तक पालन किया जाता था जो कि सेफोलॉजी में अपनाई जाती हैं। अब यदि इनके परिणाम सही नहीं आ रहे हैं तो उसकी एक बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर एग्जिट प्रायोजित होते हैं और ऐसी स्थिति में सही परिणाम आने की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।”
अमिता वर्मा भी ये मानती हैं कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें जो भी देखने को मिला है वो इन एग्जिट पोल्स में नहीं दिख रहा है। वो कहती हैं, “उत्तर प्रदेश में जिस तरह से सपा और बसपा के बीच वोट ट्रांसफर हुए हैं, उन्हें देखते हुए गठबंधन काफी मजबूत रहा है। हां, ये भी सही है कि बीजेपी को जिस तरह से काफी बड़े नुकसान की बात की जा रही थी, वैसा नहीं होगा। लेकिन एग्जिट पोल पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है।”
वहीं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण शुक्ल यूपी में बीजेपी के पक्ष में माहौल को देखने के बावजूद एग्जिट पोल्स पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। उनका कहना हैं, “2017 के विधानसभा चुनाव को ही देख लीजिए। किसी ने नहीं कहा था कि बीजेपी इतने बड़े बहुमत से जीतेगी। हालांकि जमीन पर बीजेपी के पक्ष में काफी माहौल था लेकिन चुनाव पूर्व सर्वेक्षण इतनी सीटें तब क्यों नहीं देख पाए।
इन सर्वेक्षणों के अनुमान तमाम लोगों के व्यक्तिगत अनुमानों से ज्यादा अलग नहीं दिखते हैं। दरअसल, इन सर्वेक्षणों में जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वो जमीनी हकीकत को नहीं पहचान पाती। उत्तर प्रदेश का मतदाता काफी परिपक्व है। वो इतनी जल्दी अपने रुझान को किसी के सामने स्पष्ट नहीं कर देता और इस बार के चुनाव में तो ये बात खासतौर पर देखने को मिली हैं।
दरअसल, ज़मीनी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया को कवर करने वाले ऐसे तमाम पत्रकार हैं जिनकी चुनाव परिणामों पर अपनी अलग-अलग राय है, लेकिन ये लोग भी एग्जिट पोल्स पर बहुत भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। श्रवण शुक्ल कहते हैं कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में ही कितना अंतर है, जो ये बताने के लिए पर्याप्त है कि किसी एक सर्वमान्य प्रक्रिया का पालन इसमें नहीं किया जाता है।
श्रवण शुक्ल साफ कहते हैं कि एग्जिट पोल्स के नतीजों को यूपी के संदर्भ में बिल्कुल नहीं माना जा सकता। वो कहते हैं, “ये पूरा खेल सिर्फ चैनलों की टीआरपी का है, इसके अलावा कुछ नहीं. 2007,2012 और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से पूर्ण बहुमत वाली सरकारें बनी हैं, उसने सभी चुनावी सर्वेक्षणों को खारिज किया है। यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजों पर बहुत भरोसा किया जाए।”
बहरहाल, सोशल मीडिया पर भी इन सर्वेक्षणों की जमकर चर्चा हो रही है और लोग अपनी तरह से मूल्यांकन कर रहे हैं। साथ में ये सलाह भी दी जा रही है कि वास्तविक परिणाम आने में अब दो दिन ही तो बचे हैं। आज पूरे दिन सोशल मीडिया पर एग्जिट पोल पर काफी चर्चा जमकर हो रही है।
जहां देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार इसे एक प्रायोजित एग्जिट पोल कह रहे हैं, इसमें से एक वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा ने खुलेआम कहा कि सभी एग्जिट पोल करने वाले एजेंसियों को पीएमओ के तरफ से फरमान जारी किया गया था कि एनडीए गठबंधन को 300 से भी ज्यादा सीट दिखाया जाये। जिससे कि विपक्ष का मनोबल टूट जाए और वास्तविक चुनाव परिणाम अपनी ओर किया जाये।
शर्मा ने आगे कहा कि एग्जिट पोल के दो एजेसियां खुलेआम लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रबंधन में करते हैं तथा एक एजेसी का तो सारा का सारा आदमी आरएसएस समर्थित कैडर है। इसके साथ-साथ दूसरे पत्रकार प्रसून वाजपेयी ने कहा जमीनी रिपोर्ट के अनुसार भाजपा किसी भी हालत में 163 सीट से ज्यादे नहीं आ सकती है।
वाजपेयी ने आगे कहा कि इस पुरे एग्जिट पोल में पैसे का पूरा खेल हुआ है। इसी के संबंध में जमीनी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया को कवर करने वाले ऐसे तमाम पत्रकार हैं जिनकी चुनाव परिणामों पर अपनी अलग-अलग राय है, लेकिन ये लोग भी एग्जिट पोल्स पर बहुत भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।
ऐसे ही एग्जिट पोल 2014 के लोकसभा चुनाव में भी आये थे। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजों पर बहुत भरोसा किया जाए। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि एग्जिट पोल एक कमाई का बहुत बड़ा धंधा है। इस एग्जिट पोल से समाचार चैनल वाले 3 दिनों के अंदर करोड़ों रूपये कमाते हैं, जबकि एक एग्जिट पोल बनाने में मात्र 50-1.5 करोड़ रूपये लगते हैं।
इसी क्रम में पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों और लोकसभा चुनावों के एग्जिट पोल भी वास्तविकता से काफी दूर रहे हैं इसलिए इस बार ये कितने सही होंगे, इस पर विश्वास करना मुश्किल है।
लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के राजनीतिक संपादक सुभाष मिश्र कहते हैं कि ज़मीन पर जो भी रुझान देखने को मिले हैं उन्हें देखते हुए सीटों की ये संख्या कतई वास्तविक नहीं लग रही है।
वो कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में जिस तरीके की जातीय और क्षेत्रीय विविभता है, मतदान के तरीकों और रुझानों में जितनी विषमता है, उनके आधार पर इस तरह से सीटों का सही अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल होता है। ज्यादातर सर्वेक्षण बीजेपी के पक्ष में एकतरफा नतीजा दिखा रहे हैं, जो संभव नहीं लगता है।
जितना मैंने यूपी में जमीन पर देखा और समझा है, उसके अनुसार कह सकता हूं कि गठबंधन अच्छा करेगा। उपरोक्त बातों से स्पष्ठ हो गया है कि एग्जिट पोल एक तरह से मनगढ़त, फरेब और झूठा है।
Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close