टुडे न्यूज़ताजा खबरराजनीतिसंपादकीय

भाजपा मजबूत और जजपा, इनेलो, बीएसपी और एलएसपी दौड़ में पीछे

हरियाणा की राजनीती करवट बदलते जा रही है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी की मनोहर लाल सरकार मेयर के साथ जींद उपचुनावों में जीत हासिल करने के बाद उसके हौसले बुलंद है तो वही ठीक दूसरी तरफ हरियाणा के पडोसी राज्यों में कांग्रेस की जीत के बाद भी हरियाणा में लगतार चुनाव में कांग्रेस की हार ने उनके हौसले पस्त जरूर कर दिए है। इनेलो जहां अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में अब ओमप्रकाश चौटाला के आसरे बैठी है तो वही ठीक दूसरी तरफ जजपा इनेलो को तोड़ कर उनके कार्यकर्ता के बलबूते आगामी चुनाव लड़ने की तैयारी में है. लोकत्रांत सुरक्षा पार्टी ने एससी और सैनी वोटो पर नजर रखने के लिए बसपा से हाथ मिलाया है तो ठीक दूसरी तरफ बसपा को इनेलो का कमजोर साथ से आखिरकार मुक्ति मिलने की ख़ुशी है। इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी जजपा से गठबंधन कर भर्ष्टाचार मुक्त छवि के दम पर हरियाणा की सियासत को बदलना चाहती है। मगर इस नए राजनितिक खेल में कौन बाजी मारेगा। फिलहाल सत्ता का सुख भोग रही भाजपा की इन दिनों पांचो उंगली घी में है।

यही कारण की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाडले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपने पार्टी के मुखिया को जिताने के लिए कमर कास ली है। हाल में मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने एक जोरदार जोशीला भाषण देते हुए कहा कि देश में फिर एक और बार मोदी सरकार लाने और 400 सीटें हासिल करने के लक्ष्य के साथ लोकसभा चुनाव में हरियाणा की तमाम भाजपा टीम उतरेगी। इस दौरान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एक महत्वपूर्ण बात कह डाली। उन्होंने पार्टी की आगामी चुनावों को लेकर भाजपा की दशा और दिशा बताई और कहा कि इस लोकसभा और विधानसभा भाजपा पहले वादों पर चुनाव लड़ती थी, लेकिन इस बार उपलब्धियों के साथ मैदान में उतरेंगे। पुराना शुगर मिल मैदान में आयोजित जनविश्वास रैली के माध्यम से सरकार ने जनता के दिलों में अपने काम के साथ विशवास पैदा करने का दम भर दिया है।

यह भाजपा का वो मास्टर स्ट्रोक है जिसका साइड इफ़ेक्ट जींद उपचुनाव जित कर भाजपा ने दिखा दिया कि आज के समय में उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता। यह बात हम नहीं हरियाणा की जनता ने ही दिखा दिया। अब जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को प्रदेशाध्यक्ष बनाने की कवायद है तो ऐसे में मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके सांसद पुत्र पर जोरदार हमला करना भी शुरू कर दिया है। इन दिनों मुख्यमंत्री खुले आम कहते फिर रहे है कि रोहतक लोकसभा सीट से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का बच्चा दीपेंद्र हुड्डा पिछले 15 साल से सांसद है। जब वह पहली बार जीता, तब उसके बापू सांसद थे, दूसरी और तीसरी बार जीते तब भी बापू सीएम थे। मगर इस बार न बापू सांसद हैं और न मुख्यमंत्री।

अबकी बार जनता के हाथ में सबकुछ है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जानते है कि रोहतक का गढ़ अगर टूट गया तो लोकसभा की 10 सीटों में उनकी जीत सुनिश्चित है। मनोहर लाल ने सांसद दीपेंद्र हुड्डा को टारगेट करते हुए कहा कि उन्होंने अपने चहेते लोगों को फायदा पहुंचाया था, जो उनके इर्द-गिर्द घूमते थे। उन्होंने मतदाताओं का आह्वान किया कि रोहतक लोकसभा चुनाव में भी जींद जैसा करिश्मा करके दिखाए। उनके जीवन को सुखी बनाने की गारंटी भाजपा सरकार देती है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने पुराने जख्मों को खुरदते हुए कहा कि “रोहतक को जलाने वालों को सिखाना होगा सबक”

जाट आरक्षण के कारण मनोहर सरकार विवादों में आई थी। इसी मुद्दे में मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उन लोगों को सबक सिखाने का काम करें, जिन्होंने रोहतक को जलवाया था। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने रोहतक को जलवाया, उन्हीं लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए जाति के नाम पर समाज को भिड़वाने का भी काम किया। इन चुनावी भाषण ने बता दिया की भाजपा की राह आसान है. लोकसभा ही नहीं विधानसभा में भी भाजपा को मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी।

इनेलो का अंजाम लोकसभा और विधानसभा में हो सकती है जमानत जब्त ? बसपा द्वारा गठबंधन तोड़ने के बाद इनेलो के सियासी भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है। जींद उपचुनाव में दोनों पार्टियों के सारे प्रत्याशी को जब 3400 वोट हासिल हुए थे तो अकेले इनेलो के वोटों का अनुमान लगाकर यह बताया जा सकता है कि उसका खेल खत्म हो चुका है। अभय चौटाला ने जींद उपचुनाव में ज्यादा वोट हासिल करने के लिए हर हथकंडा इस्तेमाल किया लेकिन जनता ने उनको कोई घास नहीं डाली और उनका सूपड़ा साफ कर दिया। बसपा के गठबंधन तोड़ने के कारण इनेलो के पास सफाई देने के लिए कुछ भी नहीं है और उसकी सत्ता की दावेदारी मटियामेट होने के अलावा आगामी चुनाव में उसका खाता खुलने पर यकीन करने वाले बेहद कम लोग बचे हैं। इनेलो के पास अब भाजपा हाईकमान के पास गठबंधन के लिए हाथ जोड़ने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है। अगर इनेलो ने आगामी चुनाव अकेले लड़ा तो लोकसभा चुनाव में 100 फ़ीसदी और विधानसभा चुनाव में 90 फीसदी सीटों पर जमानत जब्त हो सकती है। यही कारण है की अब इनेलो को बचाने के लिए ओपी चौटाला ने कमान संभाली है

अब बात करते है लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी और बसपा के गठबंधन की। क्या उनका गठबंधन अवसरवादिता है ? हालाँकि मुख्यमंत्री ने कहा कि राजनीति में होने वाले गठजोड़ हताशा और भय के कारण हो रहे हैं। यह अवसरवादिता के गठबंधन हैं। इनका जनहित से कोई सरोकार नहीं है। भाजपा की नीतियों व बढ़ते जनाधार से विपक्षी पार्टियों में डर है। 1971 में इमरजेंसी के दौरान जो गठबंधन हुआ था, वह कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों के कारण हुआ था। जनता की समस्याओं को लेकर गठबंधन करने में कोई बुराई नहीं है। मगर आज भाजपा को एलएसपी और बसपा का गठबंधन अवसरवादी लगता है।

बसपा और लोसपा ने प्रदेश की सियासत में नया मोड़ देने का काम कर गई। जींद उपचुनाव में इनेलो बसपा गठबंधन प्रत्याशी की शर्मनाक “जमानतजब्ती” ने इनेलो बसपा गठबंधन को टूट की कगार पर पहुंचा दिया था। बसपा हाईकमान को यह साफ साफ पता चल गया कि सांसद दुष्यंत चौटाला के चले जाने के बाद इनेलो वोटबैंक के लिहाज से खाली हो गई है और उसका सियासी भविष्य जीरो हो गया है। जींद उपचुनाव में इनेलो प्रत्याशी को सिर्फ 3400 वोट मिलने के कारण बसपा को इनेलो के साथ अपना गठबंधन बेमतलब का महसूस हुआ और आगामी चुनाव में शर्मनाक पराजय की फजीहत से बचने के लिए उसने इनेलो के साथ गठबंधन तोड़ना ही बेहतर समझा। यह सही भी है कि सांसद दुष्यंत चौटाला द्वारा जननायक जनता पार्टी का गठन किए जाने के बाद इनेलो वोटबैंक और कैडर दोनों के लिहाज से खाली हो गई है।

इनेलो को न तो जनता का समर्थन हासिल हो पा रहा है और न ही अभय चौटाला जनता की पसंद बन पा रहे हैं। अधिकांश इनेलो कैडर के जेजेपी में चले जाने के कारण इनेलो खस्ताहाली की कगार पर पहुंच गई है। जींद उपचुनाव में जिस तरह से जनता ने इनेलो को नकार दिया उससे बसपा को यह महसूस हो गया कि इनेलो के साथ रहना उसे भी सियासी रूप से खत्म कर देगा जो उसकी साख को भी खराब करने का काम करेगा। गठबंधन के खराब भविष्य को साफ-साफ देखते हुए बसपा हाईकमान ने इनेलो को बाय बाय कर कर सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी को साथ नया गठबंधन बनाना बेहतर लगा।

वही कांग्रेस आज चुनाव के मद्देनजर अपनी अपनी पोस्ट संभालने में जुटी है. पार्टी आलाकमान जिस प्रकार से पार्टी में बदलाव करने जा रहा है और पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा और कुलदीप बिश्नोई अध्यक्ष पद की भागदौड़ में दिल्ली से हरियाणा पसीने बहा रहे है. उन्हें अब लगता है कि जल्द कांग्रेस एकजुट होगी और आगामी चुनाव में बाऊंस बैक कर अपने सफलता का परचम फहराएंगी। वही जजपा ने इनेलो के गढ़ को तोडा है और इनेलो के काफी नेताओ और कार्यकर्ताओ को पार्टी में शामिल किया। जजपा को लगता है कि दुष्यंत की साफ़ छवि का उन्हें फायदा मिलेगा। मगर जिस प्रकार चुनाव में कभी भाजपा का साथ देने से लोगो का विश्वास भी उनसे उठ गया है. पहले आप के केजरीवाल कोसने वाले ने उनसे हाथ मिला ने के बाद उनके अन्दर हरियाणा का भविष्य देखना मूर्खता।

Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close