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बड़े चौधरी का खेल और मनोहर चाचा का दिमाग

Mahesh Mehta Hisar Today
इतिहास दोहराता है। खैर इनेलो पार्टी के बड़े चौधरी साहब यानी ओमप्रकाश चौटाला इनेलो पार्टी और परिवार में बिखराव से हो रहे राजनीतिक खामियाजा और नुकसान की भरपाई करने के लिए खुद ही मैदान पर उतर आए हैं।
वो वह तमाम कोशिशों में लगे हैं जिससे पार्टी को संजीवनी मिल सके। पिता जानते हैं कि उनका छोटा बेटा अभय अब अकेला है, ऐसे में अपने छोटे बेटे अभय चौटाला को मजबूत करने के लिए पिता ओमप्रकाश चौटाला तिहाड़ से फरलो पर बाहर आते ही पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं।
जगह जगह दौरे पर दौरे कर रहे है। बैठकंे, सभायंे ले कर माहौल बना रहे हंै। यही नहीं हर जगह वह इशारों-इशारों में अपने बड़े बेटे अजय चौटाला व उनके बेटों दुष्यंत व दिग्विजय चौटाला पर भी निशाना साध रहे हैं। वैसे ऐसा कुछ लोगों का कहना है कि तिहाड़ जेल से ओमप्रकाश चौटाला फरलो पर इस शर्त पर बाहर निकले कि सबसे बड़े चौधरी किसी राजनीतिक कार्यक्रम में न भाग लेंगे न शिरकत करेंगे।
लेकिन बड़े चौधरी अपने पुराने तेवरों के साथ रण मैदान में डटे हुए हैं। वह इनेलो की नैय्या पार लगाने के लिए इतना बेचैन हंै कि उन्होंने एक सभा में यहां तक कह डाला कि लोकसभा चुनाव में वे पार्टी वर्करों के बीच होंगे और खुलकर प्रचार करेंगे, इसके लिए चाहे उन्हें जेल तोड़कर बाहर आना पड़े। वैसे राजनीति में इस तरह की बातें कह तो दी जाती है, मगर उसका क्या फर्क पड़ता है यह कहना मुश्किल है।
बता दें कि हरियाणा के बड़े चौधरी के अलावा हरियाणा में भाजपाई सांसदों राव इंद्रजीत सिंह, धर्मबीर सिंह और रमेश कौशिक के तेवर इन दिनों बदले-बदले हुए नजर आते हैं। पिछले कुछ महीनों तक मुखर रहने वाले ये नेताजी अब शांत नजर आ रहे हैं। 5 निगमों के चुनाव और जींद उपचुनाव में भाजपा की जीत के बाद इनका कुछ ज्यादा ही हृदय परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
भिवानी-महेंद्रगढ़ से सांसद धर्मबीर सिंह ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि 2019 में वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब मन बदला तो कहने लगे कि पार्टी अगर चाहेगी तो वे जरूर चुनाव लड़ेंगे।
सोनीपत वाले पंडित जी रमेश कौशिक का मन भी डावांडोल रहा, लेकिन अब वे भी चुनाव लड़ने को तैयार हैं। अब तो टिकट की लॉबिंग भी उन्होंने शुरू कर दी। वही खट्टर काका की कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले बड़े राव साहब इंद्रजीत सिंह के तेवर भी नरम पड़ते दिख रहे हैं। कमाल है खट्टर जी आपकी रणनीति का।
कहने को तो अपने मनोहर लाल खट्टर समेत उनकी पूरी कैबिनेट सार्वजनिक तौर पर यही कह रही है कि लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव नहीं होंगे। पार्टी के हरियाणा मामलों के प्रभारी अनिल जैन भी मीडिया में यह बयान दे चुके हैं, लेकिन अधिकांश सियासी दल अब भी दुविधा में हैं। हर किसी पार्टी के मन में यह बात है कि विधानसभा चुनाव समय से पहले हो सकते हैं। अब कई दल तो ऐसे हैं, जिनकी अभी तक तैयारी भी नहीं है।
बताते हैं कि खट्टर की सरकार इसी बात का फायदा उठाने की कोशिश में है। वैसे अगर चुनाव जल्दी हो गया तो विपक्षी दलों को लेने का देना पड़ जाएगा। क्योंकि इस बार लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव में नई पार्टी को अपना दमखम दिखाने के साथ अपना भविष्य बचाना है और कुछ पार्टी को अपना अस्तित्व। जिसके चलते अब इस असमंजस से कइयों का खेल बिगाड़ा हुआ है।
हरियाणा की राजनीति की चर्चा हो तो अपने खट्टर चाचा के विश्वासपात्रों में शामिल जवाहर यादव पहले ऐसे नेता थे, जिनकी सरकार बनने के बाद सबसे पहले सीएमओ में बतौर ओएसडी एंट्री हुई थी। सालभर बाद ही उनके विरोधियों की वजह से उन्हें सीएमओ से बाहर जाना पड़ा। ओएसडी पद पर अन्य की एंट्री के बाद उन्हें हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन जैसा बड़ा पद सौंपा गया। तीन से भी अधिक वर्षों तक चेयरमैन रहने के बाद जवाहर अब पार्टी संगठन में आ गए हैं।
उन्हें भाजपा का संचार एवं प्रचार प्रमुख बनाया गया है। कहने वाले कह रहे हैं कि विरोध करने वालों की यहां भी कमी नहीं थी, लेकिन पहले की तरह इस बार भी मनोहर चाचा का पूरा ‘आशीर्वाद’ उन्हें मिला है। इसे जवाहर का कद बढ़ने के तौर पर भी देखा जा रहा है।
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