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नाॅन जाट पर भाजपा का बड़ा दाव

रोहतक संसदीय क्षेत्र की कोसली सीट के अलावा बादली व झज्जर में बसे अहीरों के वोट भाजपा में लाने का राव इंद्रजीत को मिला ईनाम

  1.  क्या भाजपा की जाट मतों के बाद अब दलित वोट, गुर्जर और पिछड़ा वर्ग का वोट साधने की रणनीति का हिस्सा तो नहीं
  2. एलएसपी-बीएसपी गठबंधन का तोड़ कटारिया को मंत्रिमंडल में मिली एंट्री
  3.  कृष्णपाल की मंत्रिमंडल में नियुक्ति फरीदाबाद की विधानसभा के साथ गुर्जर और पिछड़ा वर्ग पर भाजपा की नजर
अर्चना त्रिपाठी | हिसार
कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार बृजेन्द्र सिंह, सुनीता दुग्गल, अरविन्द शर्मा या राव इंद्रजीत को मोदी सरकार की दूसरी पारी में महत्वपूर्ण मंत्रिमंडल में जगह मिल पाएगी।
मगर अमित शाह जो भाजपा के चाणक्य कहे जाते हैं उन्होंने इस बार सांसद चुनाव में हरियाणा में जातिगत फैक्टर को तोड़ दिया। मगर इस बार मंत्रिमंडल की बैठक में वह ऐसे हरियाणा के नेताओं को लेने की कोशिश कर रही थे, जो आगामी विधानसभा चुनाव में उनके लिए सरदर्द बनकर साबित हो सकते हैं।
इस बार मंत्री मंडल में हरियाणा के 3 सांसदों को जगह दी गई है। उनमें शामिल हैं नॉन जाट चेहरा के तौर पर मशहूर 5 बार लगतार सांसद बनने का रिकॉर्ड कायम करने वाले भाजपा नेता राव इंद्रजीत सिंह, नॉन जाट चेहरा के तौर पर पहचाने जाने वाले कृष्णपाल गुर्जर को मोदी सरकार में दुबारा मौका मिला है, वह पिछले बार राजयमंत्री रहे थे।
वहीं तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण नाम है दलित चेहरा के तौर पर मशहूर चेहरा रतनलाल कटारिया का। माना जा रहा है कि इन तीनो नामो का चयन किसी खास मकसद के साथ और आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए किया गया है।
बता दें कि लोकसभा चुनाव में जहां भाजपा ने जाट बेल्ट रोहतक और सोनीपत के गढ़ को सेंध लगाने में कामयाबी हासिल कर सभी जगह नॉन जाट प्रत्याशियों को मौका दिया और वह जीत कर आये। उससे हरियाणा में काफी समय से चली आ रही जाट-नॉन जाट के समीकरण को तोड़ने में भाजपा ने कामयाबी हासिल की।
एक तरफ जाट मतदाताओं के दबदबे वाली इनलो पार्टी को उन्होंने खत्म किया। मगर उसने इस चुनाव में महसूस किया कि पहले कांग्रेस और अब दलित वोटों को रिझाने के लिए बसपा और लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी का जन्म

हरियाणा में उन्हें आगामी समय में खतरा बनकर साबित हो सकता है।

यही कारण है कि काफी दलित वोट जो पहले कांग्रेस और एलएसपी और बसपा के पाले में डाइवर्ट हो रहे हैं उन्हें रोकने के लिए उन्होंने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दलित नेता के तौर पर रतन लाल कटारिया को मंत्रिमंडल में शामिल किया। रतन लाल कटारिया वही नेता हैं जो पहले मीडिया के सामने कान पकड़ते और जनता के विरोध प्रदर्शन का जन्मकर सामना कर चुके हैं। ऐसे में भाजपा हाईकमान की यह रणनीति आगामी चुनाव में बहुत असर डाल सकती है।
कृष्णपाल के चयन के साथ पिछड़ा वर्ग और गुर्जरों को खुश करने की भाजपा की कोशिश
कोई तो कहता है कि फरीदाबाद के सांसद कृष्णपाल गुर्जर को उनके दोस्ती का इनाम मिला, मगर ऐसा नहीं है मोदी सरकार अपना हर फैसला किसी के दोस्ती-रिश्ते पर नहीं आगामी चुनावी समीकरण को देखा कर लेती है। चूंकि फ़रीदाबाद में जातिगत पहलू पर नजर दौड़ाये तो उस हिसाब से इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा करीब ढाई लाख जाट वोटर्स हैं।
उनके बाद बारी आती है गुर्जर मतदाताओं की। माना जाता है कि करीब 2 लाख गुर्जर, 2.20 लाख अनुसूचित जाति, 1.50 लाख ब्राह्मण, 1.30 लाख पंजाबी, 1.25 लाख मुस्लिम, एक लाख पिछड़ी जाति, 80 हजार बनिया, 50 हजार अहीर (यादव), 50 हजार राजपूत और 50 हजार ही अन्य जातियों के भी मतदाताओं का समावेश फ़रीदाबा में होता है। इतना ही नहीं भाजपा को अगर विधानसभा चुनाव में अपने मिशन को सफल करना है तो उनको फरीदाबाद लोकसभा क्षेत्र में विशेष ध्यान भी देना होगा।
क्योंकि संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत कुल 9 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। जैसे हाथिन, होडल, पलवल, पृथला, फरीदाबाद एनआईटी, बडकल, बल्लबगढ़, फरीदाबाद और तिगांव। इनमें से तीन-तीन सीट पर कांग्रेस और बीजेपी का कब्जा है, जबकि दो सीट INLD के खाते में है और पृथला से बीएसपी के टेक चंद शर्मा भी विधायक हैं। यानी कि मिशन पूरा करने के लिए भाजपा को यहां से 6 सीटें जीत कर लानी होगी। यही कारण है कि इसकी जिम्मेदारी फरीदाबाद के सांसद कृष्ण पल गुर्जर पर बनी रहेगी।
यही कारण है कि पार्टी ने उन्हें बतौर राजयमंत्री कैबिनेट में जगह दी। यह दूसरी बार है कि मोदी सरकार ने उनपर भरोसा जताया है। वैसे हरियाणा भाजपा में पुराने और कर्मठ नेताओं में गुर्जर की गिनती की जाती है। मोदी पार्ट-1 में भी गुर्जर को राज्य मंत्री बनाया गया था। सीएम मनोहर लाल खट्टर के साथ भी गुर्जर की बेहतर अंडरस्टैंडिंग है। गुर्जर हरियाणा में भाजपा विधायक दल के नेता भी रहे हैं।
इस बार उन्होंने फरीदाबाद से कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना को साढ़े छह लाख के करीब वोटों से चुनाव हराया है। भड़ाना और गुर्जर के बीच छत्तीस का आंकड़ा माना जाता है। सूत्रों का कहना है कि गुर्जर को कैबिनेट में जगह देकर मोदी ने हरियाणा के पिछड़ा वर्ग के साथ-साथ राजस्थान के गुर्जरों को भी खुश करने की कोशिश की है। गुर्जर की गिनती प्रदेश के जुझारू नेताओं में भी होती है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रहते हुए उन्होंने दिव्यांग लोगों के लिए काफी काम किया। इतना ही नहीं 2014 के बाद से गुर्जर का फरीदाबाद लोकसभा क्षेत्र में अच्छा प्रभाव देखने को मिला है। गुर्जर इस बार लोकसभा चुनाव में सभी 9 हलकों से भारी अंतर से चुनाव जीत हासिल कर के आये हैं।
कांग्रेस के जाट नेताओं को निपटाकर भाजपा ने नॉन जाट वोटरों का जीता दिल
बता दें कि इस बार मोदी सरकार के दूसरी पारी में जहां कई वरिष्ठों को जगह नहीं मिली, वहीं हरियाणा की खुशनसीबी थी कि यहां से 2 नॉन जाट नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह प्रदान की गयी। यह सभी जानते हैं और कितना भी इंकार करें, मगर यह बात सही साबित होती है कि हरियाणा का हर चुनाव जाट-नॉन जाट के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है।
मगर इस बार लोकसभा चुनाव में जाट बेल्ट रोहतक और सोनीपत में नॉन जाट चेहरा को मौक़ा देकर जहां एक तरफ भाजपा ने अपनी नॉन जाट की छवि को कायम करने में कामयाबी हासिल की है। साथ ही जाट नेता के तौर पर माने जाने वाले कांग्रेस के नेताओं को शिकस्त देकर उन्होंने एक तीर से दो निशाना कर जाट नेताओं को ही समाप्त करने का काम किया है।
यही कारण है कि अब किसी अन्य पार्टी का कोई जाट नेता आज भाजपा को चुनौती नहीं दे सकता, साथ ही नॉन जाट वोटर जो पहले कांग्रेस से जुड़ा करते थे अब वह भी भाजपा के पाले में आ चुके हैं।
लोकसभा ,चुनाव में मोदी ने की थी दलितों की बात, अब दलित नेता को दिया मंत्रिमंडल में स्थान
याद है कि वाल्मीकि जयंती के दिन प्रधानमंत्री की रोहतक में रैली थी। उन्होंने मुख्यमंत्री हुड्डा पर निशाना साधा कि मुख्यमंत्री के इलाके में दलित लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं। मोदी 2002 की अनुसूचित जाति जनजाति आयोग की रिपोर्ट का भी ज़िक्र कर रहे थे कि 19 लड़कियों के साथ दलित हिंसा हुई है।
इसका अर्थ साफ था कि 12 साल पुरानी रिपोर्ट का जिक्र करके मोदी एक एक दलित वोट पाने की कोशिश में थे। याद है प्रधानमंत्री ने रोहतक रैली में एक बार तिरंगे का हवाला देते हुए कहा कि उसमें सिर्फ तीन रंग नहीं है। अशोक चक्र में नीला रंग भी है। मैं चार रंग की क्रांति लाना चाहता हूं। केसरिया क्रांति मतलब लोगों को ऊर्जा, बिजली। सफेद क्रांति अर्थात देश में दूध का उत्पादन बढ़ाना।
हरित क्रांति अर्थात खेती। वहीं सबसे महत्वपूर्ण रहा नीली क्रांति अर्थात समुद्र की शक्ति बढ़ाने,बंदरगाहों को मज़बूत करने और मछुआरों को बढ़ावा देने से था। इतना ही नहीं तब मोदी ने नीली क्रांति के नाम लिया तो उसके साथ उसे दलितों से जोड़ कर देखा गया। यही कारण है कि इस बार एक दलित नेता को मंत्रिमंडल में शामिल करना उनकी आगामी रणनीति का हिस्सा है।
नॉन जाट चेहरा राव इंद्रजीत को मंत्रिमंडल में शामिल करना भाजपा की मजबूरी
बता दे कि केंद्र में मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही भाजपा ने हरियाणा में विधानसभा चुनाव की बिसात बिछा दी है। अहीरवाल की एक दर्जन सीटों को साधने के लिए पार्टी ने एक बार फिर ‘रामपुरा हाउस’ का दबदबा कायम रखा है।
राव इंद्रजीत सिंह को सरकार में शामिल करके मोदी ने अहीर बाहुल्य दक्षिण हरियाणा की सीटों में फिर से भगवा फहराने का दांव चला है। मोदी कैबिनेट में राव इंद्रजीत सिंह लगातार दूसरी बार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने हैं। बता दे कि मोदी पार्ट-। में वे राज्य मंत्री रहे। 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राव इंद्रजीत सिंह के प्रभाव की बदौलत ही अहीरवाल की सभी सीटों पर जीत हासिल की थी।
यह कहना गलत नहीं होगा कि यही राव इंद्रजीत सिंह है जिनके कारण ही भाजपा राज्य में पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई। यही कारण है कि इस बार भी अगर भाजपा मिशन 72+ को लेकर आगे बढ़ रही है तो वह चाहेगी कि पिछली बार की विधानसभा में भाजपा को मिली जीत दुबारा उनके खाते में आये और भाजपा का मिशन विधानसभा निर्णायक दौर पर आये यही कारण है कि तीन-चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही राव को मंत्रिमंडल में लिया गया।
बता दें कि अहीरवाल में ‘रामपुरा हाउस’ का पुराना प्रभाव है और राव इंद्रजीत सिंह को इस इलाके का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। उनके दिवंगत पिता राव बीरेंद्र सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। हालांकि खुद इंद्रजीत सिंह भी कई बार अहीरवाल की चौधर का नारा देते रहे हैं, लेकिन उनका यह सपना आज तक पूरा नहीं हो सका है।
वैसे भाजपा यह भी जानती थी कि अगर इस बार मंत्रिमंडल में उन्हें शामिल नहीं किया गया तो हमेशा मुख्यमंत्री से खटपट की चर्चाओं में रहने वाले राव इंद्रजीत नाराज हो जाते और इसका खामियाजा पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में भी भुगतना पड़ता। इतना ही नहीं खास बात यह है कि हो सकता है कि इस बार भाजपा की टिकट से राव इंद्रजीत सिंह अपनी बेटी आरती राव को भी राजनीति में उतार सकते हैं।
देखा जाए तो अहीरवाल के तीन जिलों रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ व गुरुग्राम के अलावा झज्जर व भिवानी के अहीर बाहुल्य इलाकों में भी इंद्रजीत का अच्छा खास प्रभाव माना जाता है। इस बार के लोकसभा चुनावों में इसका असर भी साफ दिखा है। गौरतलब है कि इस बार रोहतक संसदीय क्षेत्र की कोसली सीट के अलावा बादली व झज्जर में बसे अहीरों ने भी भाजपा के समर्थन में खुलकर वोट किया और यही बात राव इंद्रजीत के पक्ष में गई।

जाटों के बाद अब दलित वोटबैंक पर भाजपा की नजर इसीलिए कटारिया की लगी लॉटरी

बता दें कि खास रणनीति के तहत इस बार की लोकसभा चुनाव में जहां जाट वोट बैंक को तोड़ने में भाजपा कामयाब हुई, वहीं इस चुनाव में उन्होंने पाया कि भाजपा से बगावत कर हरियाणा में अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने वाले राजकुमार सैनी बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ इस चुनाव में क्षेत्रीय पार्टी इनेलो से कई गुना ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर दलित वोट काटने में कामयाब रहे।
इतना ही नहीं भाजपा ने यह भी पाया कि इस बार दलित वोट भाजपा से दूर हुए है। आकड़े बताते है कि अम्बाला में एलएसपी-बीएसपी गठबंधन के नरेश कुमार को 96,205 वोट, भिवानी -महेंद्रगढ़ से रमेश पायलट को 20,170, फरीदाबाद से मनधीर मान को 86,694, गुरगाँव से चौधरी अहमद को 26,706 वोट, हिसार से सुरिंदर शर्मा को 45,090 वोट, करनाल से पंकज को 67,091 वोट,
कुरुक्षेत्र से शशि को 75,533 वोट, रोहतक से कृष्णा लाल को 38,163 वोट, सिरसा से जनक राज को 25,080 वोट, सोनीपत से राज बाला को 34,958 वोट प्राप्त हुए। जो भाजपा के लिए चिंता का विषय था कि कहीं हरियाणा में दलितों को पर्याय न मिल जाए इसलिए उन्होंने कांग्रेस के साथ एलएसपी-बीएसपी गठबंधन पर भी आगामी चुनाव में निशाना साधने के लिए और दलित वोटों को रिझाने के लिए कटारिया को बैठे बिठाये मंत्रिमंडल में शामिल कर दिया।

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