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‘नाम या काम’ में जीत किसकी!

नाम पर वोट मिलने वाले सांसदों का जनता कर रही विरोध और काम पर वोट मांगने वालों का जनता कर रही दुलार

भाजपा ने हरियाणा में “काले लिबास पर बैन” लगाने की शुरू की परंपरा
राजनीति ने आका-नेताओं को
क्या-क्या सिखा दिया
बड़े-बड़े से नेता को भी
जनता के क़दमों पर झुका दिया
राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद
सब अपनाया जाता है
जरूरत पड़े तो दुश्मन को भी
दोस्त बनाया जाता है
राजनीति का रंग भी
बड़ा अजीब होता है वही दुश्मन बनता है
जो सबसे करीब होता है,
जिन्दा रहें चाहे जान जाए
वोट उसी को दो, जो काम आए
अर्चना त्रिपाठी | हिसार
“काम” इस बार हिसार लोकसभा चुनाव में दिग्गज पार्टियों के बीच मुकाबला बेहद रोचक हो गया है। इस चुनाव के अंतिम कुछ दिन में पूरा माहौल और राजनीतिक समीकरण इस तरह से बिगड़ा हुआ है कि राजनीतिक पंडित जहां धराशाही हैं। मगर कुल मिलाकर यह चुनाव “काम वर्सेज नाम” की जंग में तब्दील हो गया है। इस दौरान अब जनता के हाथों में यह ताकत है कि उनकी कसौटी में नाम सबसे ज्यादा अहमियत रखता है या काम।
बता दें कि अक्सर ऐसा देखा गया है और हरियाणा इस बात की गवाह बनी है कि जनता नाम को देखकर वोट डालती है और जब जिसको वोट दिया और उसने काम नहीं किया तो अब 5 साल बाद उन्हें पछतावा हो रहा है कि काश नाम को देखकर वोट न देते तो आज उन्हें अपने हलके के विकास के लिए विरोध प्रदर्शन का सामना नहीं करना पड़ता।
यह बात सही इसलिए भी साबित होती है क्योंकि “रतनलाल कटारिया, रमेश कौशिक, कृष्णपाल गुर्ज्जर, भाजपा के कुछ नेताओं को जनता के खुलेआम विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। यह उदहारण इस बात का सबूत है कि अब राजनीति बदल गयी है, वोट उसको देना जनता पसंद करती है जिससे उसे काम की उम्मीद हो, बल्कि उसे नहीं जो नाम गिनाये-काम नहीं।
आज हरियाणा में यही चीज है जिसे समझने में भाजपा के वरिष्ठ नेता भी शायद नाकामयाब साबित हुए हैं। जिस प्रकार का अनियोजन इनदिनों हरियाणा की राजनीति में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का दिखाई दे रहा है उसने इस बात को साबित कर दिया है कि भाजपा हरियाणा की 10 सीटों को लेकर कितनी गंभीर है। आज भाजपा के सामने अन्य पार्टी के वो नेता और उम्मीदवार भारी पड़ रहे हैं जो आज अपने काम और भविष्यगामी योजना के लिए बात कर रहे हैं।
सबसे खास बात यह है कि जिस पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर सांसद वोट मांग रहे हैं, वो प्रधानमंत्री जिनके कार्यों का भाजपा समर्थक डंका पीटते हैं। केंद्र, राज्य में भाजपा की सत्ता है, मगर जब परफॉर्मन्स की बात करें तो 10 में से 7 सांसद भाजपा के होते हुए भी बड़ी शर्म की बात है भाजपा के लिए कि अपने हलके और प्रदेश के अहम मुद्दे संसद में उठाने में बाजी और किसी ने नहीं बल्कि जननायक जनता पार्टी के प्रत्यशी दुष्यंत चौटाला और कांग्रेस के प्रत्याशी दीपेंद्र हुड्डा ने मारी।
जबकि ठीक दूसरी तरफ अपने सांसद पद का बखूबी दायित्व न उठा पाने और जनता के सुख-दुख में उनके बीच न रहने के कारण इन्ही भाजपा सांसदों को आज जनता के रोष का सामना करना पड़ रहा है। अपने परफॉर्मन्स पर वह जनता के बीच इसलिए नहीं जा रहे हैं।

नाम पर वोट मांगने वालों से हलके की जनता निराश

बता दें कि 2014 में किसी के नाम की एक सुनामी चली थी और उस सुनामी को देखते हुए जनता ने अपने वोट दे दिए थे। मगर 5 साल बाद क्या हुआ पता है? पता करना है तो चले जाइए भाजपा सांसद रतनलाल कटारिया, रमेश कौशिक, कृष्णपाल गुर्जर के इलाकों में। इन दिनों वहां से जिस प्रकार जनता के रोष का सामना वोट मांगने गए इन सांसदों को उठाना पड़ रहा है उनकी असली तस्वीर भुक्तभोगी जनता और मतदाता देख चुके हैं।
जनता आज इनसे इतना निराश हो चुकी है कि अब वह सीधे सवाल करने लगी है कि उन्होंने क्या किया? कहां गायब रहे? आपको याद ही होगा कृष्णपाल गुर्जर की वह सभा जहां भाजपा के कार्यकर्ताओं ने विरोध जताते हुए कहा कि 5 साल में एक बार भी उन्होंने अपने सांसद को गांव में नहीं देखा। ताजुब तब दुबारा होता है कि आज भी यह लोग खुद के काम पर नहीं नाम पर वोट मांग रहे हैं। अब सवाल यह उठ खड़ा होता है कि भुक्तभोगी जनता क्या क्या दुबारा वही गलती करेगी या कुछ और निर्णय लेगी यह तो खुद उनपर निर्भर करता है।

“मैं” का दिख रहा अहंकार

इनदिनों रतनलाल कटारिया की एक मुलाकात सोशल मीडिया में जोरों से वायरल हो रही है कि “वोट मोदी के नाम पर नहीं तो क्या सोनिया के नाम पर मांगू।” इस बयान सुनकर एक सामान्य सा मतदाता भी सोचेगा कि सांसद साहब बोल क्या रहे हैं। अब कल की फतेहाबाद की मोदी रैली ही देख लीजिये मोदी यहां इस सभा में पीएम मोदी ने प्रत्याशियों के बजाय खुद के नाम पर जनता से वोट देने की अपील की।
हैरत की बात यह है कि अपने जिन प्रत्याशियों हिसार से बृजेन्द्र सिंह और सिरसा से सुनीता दुग्गल के चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आये थे उन प्रत्याशियों के साथ उन्होंने तस्वीर तो खिचवाई मगर उन प्रत्याशियों का नाम तक पीएम मोदी ने नहीं लिया। शायद उनको यह लगता होगा कि प्रत्याशियों से ज्यादा उनका नाम ही उनको वोट दिलाएग! इसलिए उन्होंने आज विजय संकल्प रैली में बृजेंद्र सिंह और सुनीता दुग्गल का जिक्र भी नहीं किया और सिर्फ अपने नाम पर कमल का बटन दबा कर लोगों से भाजपा को वोट देने का आह्वान किया।
यह हिसार में भाजपा के टीम के लिए बड़े अफसोस की बात है कि पीएम मोदी ने हिसार से भाजपा प्रत्याशी बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेन्द्र सिंह की काबलियत तो दूर उनका नाम न लेकर यह दिखा दिया कि शायद वह भी उनसे अनजान है या तो उनको उनके काम पर भरोसा नहीं। शायद पीएम मोदी को भी यह लगने लगा है कि हरियाणा में उनके पार्टी के सांसदों ने जो काम किया उसके बलबूते उनके लिए चुनाव जितना मुश्किल है। यही कारण है कि बृजेन्द्र सिंह साइड लाइन रहे और सभा में “मैं यानी पीएम मोदी” अपने कार्यों का बखान करते रहे।

10 में से 7 सांसद भाजपा के संसद में, मुद्दे उठाने में दुष्यंत आगे

बता दें कि हरियाणा के 10 सांसदों की परफॉर्मंस पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो संसद में प्रश्न पूछने वालों में हिसार के सांसद दुष्यंत चौटाला सबसे आगे रहे हैं। आठ सांसदों के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सांसद दुष्यंत चौटाला ने सबसे अधिक 675 प्रश्न संसद में पूछे, जबकि सबसे कम प्रश्न पूछने वालों में कुरुक्षेत्र के सांसद राजकुमार सैनी का नाम रहा जो इन दिनों लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के नाम से चुनाव में अपने उम्मीदवारों को उतार कर बदलाव की बात कर भाजपा को कोस रहे हैं।
जिन्होंने केवल 57 प्रश्न पूछे। इनमें सांसद राव इंद्रजीत सिंह और कृष्णपाल गुर्जर के आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। यह आंकड़े पीआरएस इंडिया, ओआरजी और लोकसभा से लिए गए हैं। 16वीं लोकसभा का पहला सत्र एक जून 2014 को शुरू हुआ था और लोकसभा सत्र का अंतिम दिन 13 फरवरी 2019 था।
कांग्रेस के एकमात्र सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने 115 सवाल पूछे और केवल 53 डिबेट में हिस्सा लिया और तीन प्राइवेट मेंबर बिल लोकसभा में रखे। उनके मुकाबले दुष्यंत चौटाला ने 21 प्राइवेट मेंबर बिल लोकसभा में पेश किए और 239 डिबेट्स में हिस्सा लिया। उनके अलावा बाकी 7 सांसदों की डिबेट्स का जोड़ किया जाए तो वह 184 ही बनता है। डिबेट्स में हिस्सा लेने के मामले में करनाल से सांसद अश्विनी चोपड़ा ने पांच वर्ष के दौरान सबसे कम केवल सात डिबेट्स में ही हिस्सा लिया।

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ऐसे में आप समझदार जनता यह सोचने में सक्षम है कि क्या इनमें से कोई बात झूठ लिखी है। आप खुद कभी गूगल में सर्च करे आपको हकीकत खुद आँखों के सामने नजर आएगी। इसलिए अब नेताओ को यह समझाना पड़ेगा की “नाम पर वोट बहुत हुआ अब अपने उम्मीदवार को बोलो काम पर वोट मांगे” मुझे तो लगता है मोदी के नाम का यह अहंकार और नाम पवार वोट माँगना भाजपा के लिए नकरात्मक संकेत दे रहा है। जिसको समझने की उनको और वरिष्ठ नेताओ को जरूरत है।
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