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गोचरण आंदोलन ओर हरियाणा की संवेदनहीनता

गंगा को अव‍िरल और न‍िर्मल बनाने के लिए गंगा एक्ट की मांग को लेकर 111 दिन से अनशन पर बैठे पर्यावरणविद् प्रोफेसर जी डी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। साल 2011 में गंगा की रक्षा के लिए अनशन करते हुए मातृ सदन के संत स्वामी निगमानंद की भी अस्पताल में मौत हो गई थी। गंगा में खनन पर रोक लगाने की मांग को लेकर अनशन पर गए निगमानंद सरस्वती का 2011 को देहरादून स्थित जौलीग्रांट अस्पताल में निधन हो गया था। हरिद्वार के पास स्थित कनखल में 1998 में निगमानंद के साथ स्वामी गोकुलानंद ने भी क्रशर व खनन माफिया के खिलाफ अनशन शुरू किया था।
हरियाणा के पानीपत के पास एक गांव है राजाखेड़ी। इसको नॉन वायलेंस विलेज के तौर पर जाना जाता है. यह गांव कई संन्यासियों की पृष्ठभूमि है। इनमें से एक हैं गोपालदास। इसी राजाखेड़ी की माटी से आते हैं। इन्होंने कोई स्कूली शिक्षा न लेकर जो कुछ सीखा, अपने आस-पास से सीखा। पेड़ों से. प्रकृति से संन्यासियों के सानिध्य में आकर ज्ञान प्राप्त किया। 28 वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया। डीप फॉरेस्ट चले गए और वहां से अपनी साधना शुरू की। बात 2011 की है। 126 दिनों से अनशन पर बैठे स्वामी निगमानंद की देहरादून के जैलीग्रांट अस्पताल में मौत हो जाती है। रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई इस मौत की निष्पक्ष जांच कराने के लिए मातृसदन में 23 दिनों का अनशन होता है। जिसके बाद इसकी जांच सीबीआई द्वारा कराई जाती है। इसी अनशन के दौरान गोपाल दास प्रोफेसर जीडी अग्रवाल यानी स्वामी सानंद के संपर्क में आते हैं। और यहीं से गंगा की अविरल धारा को बचाने के लिए संघर्षों की शुरुआत होती है। तब से लेकर अब तक गोपाल दास ने कई आंदोलन किए। 28 बार जेल गए। 50 से भी ज्यादा बार इलाज के लिए अस्पताल रेफर किए गए। 24 जून से ये एक बार फिर, स्वामी सानंद के समर्थन में गंगा को बचाने संबंधी अपनी मांगों के साथ मातृसदन में अनशन पर बैठे हैं। इसी बीच स्वामी सानंद(प्रो. जीडी अग्रवाल) ने 11 अक्टूबर को 111 दिनों के अनशन के बाद दम तोड़ दिया। जीडी अग्रवाल की मौत के बाद भी गोपालदास ने अपना अनशन जारी रखा है। लेकिन आज लगभग 145 दिन बीत जाने के बाद भी न तो सरकार का कोई नुमाइंदा और न नहीं विपक्ष का कोई नेता इनका हाल चाल लेने को तैयार है।
प्रो.जीडी अग्रवाल की मौत के बाद उत्तराखंड प्रशासन ने संत गोपालदास को उनके आश्रम से उठाकर ऋषिकेश स्थित एम्स में भर्ती कराया। इसके बाद उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया गया अब उनकी नाजुक हालत और उनके समर्थकों की मांग को देखते हुए गोपाल दास को दिल्ली के एम्स में एडमिट किया गया है। जहां वो आईसीयू में वेंटिलेटर पर जिदंगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं। गोपालदास के एम्स में एडमिट होने की खबर मिलते ही हम उनसे मिलने सीधा अस्पताल पहुंचे। दोपहर का समय था। एम्स के इमरजेंसी वार्ड की आठवीं मंजिल। उस अंतिम समय में गोपालदास ने क्या कहा शायद उसे आ भी सुनकर व्यथित हो जाए। हम उनके आखिरी इंटरव्यू के कुछ अंश बता कर आज की सरकार और उनकी राजनीति का पर्दाफाश करते है।
उन दिनों काफी कमजोर दिख रहें गोपालदास के चेहरे का भाव और बैठ पाने की असमर्थता बता रही थी कि उनकी तबियत सही नहीं है। यह तो उनकी मानसिक मजबूती है जिसने हमें उनसे आगे सवाल करने के लिए प्रेरित किया। आपको गोपालदास के बारे में एक और बात बताते चलें कि इन्होनें हरियाणा में गोचरण आंदोलन किया था। जिसने वहां सत्ता परिवर्तन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गोचरण आंदोलन गोचर भूमि विकास बोर्ड की गठन की मांग को लेकर हुआ था। ऐसे में क्या खट्टर सरकार ने आपकी उम्मीदों को पूरा किया? इस सवाल पर उनका मानना है कि ‘हरियाणा की पूर्व सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी समय में हमारी मांगें मान ली थी। शायद, कुछ दिन और रह गयी होती तो गोचरण को लेकर हमारी मांगें पूरी हो जाती। लेकिन हरियाणा की वर्तमान सरकार ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को पार कर दिया है। सरकार गंगा और गाय दोनों को एटीएम समझ रही है। जब चाहा दरवाजा खटखटा दिया और अंधी आस्था को पोलराइज कर दिया। इनकी बड़ी-बड़ी बातें केवल घोषणा पत्रों में दिखाई देती हैं। असल में कुछ भी नहीं है।’
देश के पांच राज्यों में बहने वाली गंगा सीधे तौर पर चालीस करोड़ लोगों से जुड़ी है। यह देश की सबसे बड़ी नदी है तो इसको लेकर होने वाला आंदोलन देशव्यापी क्यों नहीं हो पा रहा। क्यों यह एक या दो राज्यों तक ही सीमित रह जा रहा। इसके बारे में हर कोई जानना चाहता है मगर गोपालदास ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि यह सोचने वाली बात है कि गंगा का चीरहरण हो रहा है और लोग भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य की तरह आंख बंद करके देख रहे हैं। बात-बात पर जो लोग देश की समस्या का दोष पड़ोसी मुल्कों को देते हैं उनको भी यह समझना चाहिए कि यहां पाकिस्तान और चीन ने कोई गोलाबारूद डाल कर लोगों के दिमाग का दिवालिया नहीं बनाया है, बल्कि यह तो लोगों के अंदर चेतना का अभाव है। बड़ी ताकतों से लड़ने के लिए हमारे पास वास्तविक चीजों का अभाव है। यह कोई क्राइटेरिया तो नहीं है कि केवल इस पर उत्तराखंड का ही अधिकार है। हमने नदियों को माँ माना है। प्रकृति को माँ कहा है।’ गंगा के लिए एक ओर जहां कुछ सन्यासी अनशन पर बैठे हैं, वहीं संत समाज का एक बड़ा तबका ने इनको इस मुहिम से दूर रखा है। तो सवाल यही है कि आखिर संत समाज इस मुद्दे से क्यों व्यापक रूप से नहीं जुड़ रहा है? गोपालदास के अनुसार ‘कहीं न कहीं भय है सरकारों से। हम सब भय के साये में जी रहे हैं। कहने को तो यह संतों की सरकार है लेकिन वह भी इस मुद्दे पर हमारे साथ आने से डर रहे हैं। संत समाज के अंदर ही शायद कोई लूपहोल है। जो लोग दंगे और पंगे में विश्वास रखते हैं तो उनके लिए श्रद्धाभावना का कोई स्थान ही नहीं है। मुंह में राम बगल में छूरी वाली बात है। जय श्री राम, हिन्दू जिंदाबाद के नारे लगाने वाले और दिवाली और दशहरे की शुभकामनाएं बांटने वाले लोगों से पूछना चाहिए कि अगर रामायाण प्रमाणिक सत्य है और जब उनके भाई लक्ष्मण को शक्ति लगी तो हिमालय की ही संजीविनी ने उनको पुनः प्राणदान दिया। जब यह प्राणदायिनी और हिमालय का भी कत्ल कर सकते हैं तो फिर आम भावनाओं के साथ क्या ही न्याय करेंगे। गंगा की सफाई से जुड़ी यह मुहीम देश के करोड़ो लोगों की आस्था से सीधा संबंधित है। लगभग चार हजार करोड़ खर्च करने के बाद भी गंगा पहले के बजाय और दूषित हुई है। जिससे साफ पता चलता है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे का हल निकालने में लगभग हर मोर्चे पर असफल है। ऐसे में संन्यासियों के इस अनशन को विपक्ष की ओर से क्या कोई सपोर्ट मिला? ‘पक्ष और विपक्ष से तय करके तो यह अनशन किया नहीं है कि वो आएंगे ही। खैर, डिजिटल का यह जमाना है और अगर उनको लगता है कि ट्वीट करने से ही औपचारिकता होती है तो वह करें।
वैसे हकीकत देखा जाए तो सत्ता तो दूर विपक्ष भी इस मुहीम में उनका साथ देने में निष्क्रिय रहा। उन दिनों उन्होंने बताया था कि ‘अभी तक तो कोई नहीं आया। खाली कुछ सूचनाएं सोशल मीडिया के माध्यम से आई हैं। जिन लोगों का यह चुनावी मुद्दा और एजेंडा था उन्होंने तो बात करना गंवारा नहीं किया। ऐसे में और किसी से क्या उम्मीद करें। लेकिन कम से कम विपक्ष में कुछ संवेदनाएं तो दिखी ही हैं।’ वक्त की कमी के चलते गोपालदास की प्रमुख मांगों को मोटे तौर पर जानना चाहा। अपने मुद्दे को लेकर स्पष्ट गोपालदास इस सवाल का एक सांस में जवाब देते हैं। ‘हिमालय को इकोसेंसिटिव जोन घोषित किया जाए। उस पर कोई डिस्ट्रक्शन कार्य न किया जाए। एंटी नेचर डेवलपमेंट वर्क न किया जाए। इसके अलावा हर 100 मीटर पर एक बोर्ड लगाया जाए कि गंगा का पानी आचमन योग्य या स्नान योग्य है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर एनजीटी तक सबके रिपोर्टस बताते हैं कि सरकार नमामि गंगे योजना पर झूठ बोल रही है। इस पर एक जनमत संग्रह कराया जाए। लेकिन जनमत संग्रह कराएगा कौन। जिनको कराना है उनको इस मुद्दे से कोई मतलब ही नहीं।

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