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खट्‌टर की चाल में फसे हुड्‌डा

मनीष ग्रोवर और ओमप्रकाश धनखड़ दीपेंद्र को रोहतक में उलझाने में रहे कामयाब !

Hisar Today 

  • मेयर चुनाव में भाजपा ने नहीं दी थी किसी में जाट उम्मीदवार को टिकट

  • रोहतक-सोनीपत में कांग्रेस ने जाट उम्मीदवार दिए हैं, बीजेपी ने दोनों जगह उतारे ब्राह्मण चेहरे

  • सोनीपत में जहां 5.50 लाख जाट वोट हैं वहीं रोहतक में लगभग साढ़े छह लाख हैं जाट वोटर्स

महेेश मेहता | हिसार
हरियाणा का रोहतक और सोनीपत बेल्ट जाट बहुल इलाका माना जाता है। जाट बेल्ट के नाम से मशहूर रोहतक बेल्ट में हमेशा से जाट नेता हुड्डा का दबदबा ऐसा रहा कि दशकों तक शासन करने के बाद भी किसी की हिम्मत नहीं हुयी कि हुड्डा के गढ़ में सेंध लगा सके। मगर इस बार हालात को देखकर लगता है कि भाजपा दीपेंद्र के गढ़ में सेंध लगा पाने में कामयाब हो सकती है। जिस प्रकार से चुनाव के दिन यह दोनो ही मंत्री दीपेंद्र हुड्डा का ध्यान भटकाने और उन्हें टेंशन देने में कामयाब रहे, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा अपने इस मंसूबो में कामयाब हो सकती है।
रोहतक में जाट बेल्ट की पहचान हटाने में में भाजपा के नेता बहुत पहले से ही लगे हुए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के अलावा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जाट आरक्षण आंदोलन का मुद्दा उठाकर जाट आर्कषण आंदोलन में गैर जाट लोगों के जले मकान और दूकान में लगी आग की तपन जिन्दा करने का काम किया। भाजपा ने रोहतक क्षेत्र में हुए चुनाव को जाट और नॉन जाट का चुनाव बनाकर यहां से हुड्डा का साम्राज्य और गढ़ को ध्वस्त करने का काम किया। बता दें कि हरियाणा की पांच लोकसभा सीट में इस बार भाजपा ने मोदी मैजिक और एयर स्ट्राइक का मुद्दा नहीं, बल्कि जाट आरक्षण का मुद्दा उठाकर रोहतक के चुनावी माहौल को एक अलग दिशा देने की कोशिश की। इसके पीछे भाजपा का यह मकसद माना जाता है कि अगर वह रोहतक से हरियाणा के सबसे मशहूर जाट नेता दीपेंद्र और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के गढ़ को ध्वस्त करने में कामयाब होते हैं तो भाजपा के नेता ओमप्रकाश धनखड़ एक मजबूत जाट नेता और मनीष ग्रोवर नॉन जाट नेता मिलकर रोहतक में समीकरणों को ऐसा बदल सकते हैं कि अगर चलकर हुड्डा को यहां से बोरिया बिस्तर बांध कर वापस जाना पड़ेगा। ऐसा करने में अगर भाजपा इस चुनाव में कामयाब रही तो हुड्डा खेमे के लिए दुबारा वापसी करना मुश्किल साबित होगा।
वैसे यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि तीन साल पहले हुए जाट आंदोलन के बाद से राज्य की सियासत अब सिर्फ जाट बनाम गैरजाट की हो गई है। रोहतक, सोनीपत, भिवानी-महेंद्रगढ़ में यह मुद्दा सबसे ज्यादा असरदार है। जाट आरक्षण के दौरान उस घटना की याद अब भी ताजा है जब रोहतक रेलवे क्रॉसिंग के करीब स्थित होटल नटराज के मालिक संजय सैनी मीडिया में बताते हैं कि तीन साल पहले जाट आंदोलन के दौरान उनका रेस्टोरेंट उपद्रवियों ने जला दिया था। उनके घर में अब भी उन आग की लपटों के निशान हैं। यह वह घटना थी जब उनके दिल में जो जख्म बना वह अब भी ताजा हैं। उनका मानना है कि वह सिर्फ व्यापार करना चाहते हैं मगर अपनी सियासत चमकाने के लिए सबसे ज्यादा निशाना गैरजाटों को बनाया गया। यह आगजनी की घटना भाजपा के राज में हुयी। जिसमें अधिकतर नॉन जाट प्रभावित रहे। यह भाजपा अब यहां से गैर जाट को एकत्रित करने में जुटी है। इतना ही नहीं कि रोहतक की जनता यह चाहती थी कहीं न कहीं जाटों का यह साम्राज्य खत्म हो जाए। इसलिए मतदान के दिन रोहतक में जिस प्रकार से घटनाएं घटी, वह इस और संकेत दे रही थी कि हुड्डा के लिए खतरे की घंटी है। मगर क्या भाजपा अपने मंसूबो में कामयाब रहेगी और कांग्रेस के सबसे दिग्गज जाट नेता को हरा कर बड़ा सियासी दाव खेलेंगी।
बीजेपी का इस लोकसभा क्षेत्र पर इसलिए भी ज्यादा फोकस है क्योंकि अगर चुनाव में दीपेंद्र हुड्डा को हराने में कामयाब रही तो आगामी विधानसभा चुनाव पर इसका असर पड़ेगा। खुद दीपेंद्र हुड्डा भी मानते हैं कि रोहतक का चुनाव राजनीतिक दिशा तय करेगा।

मोदी लहर में जीते दीपेंद्र के जाट वोट तोड़ने में भाजपा कामयाब
वर्ष 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बीच कांग्रेस प्रत्याशी दीपेंद्र हुड्डा 1.70 लाख वोटों से जीते थे। दीपेंद्र हुड्डा को 46.86 प्रतिशत वोट यानी कुल 4,90,063 वोट मिले थे। जबकि बीजेपी प्रत्याशी ओम प्रकाश धनकड़ को 30.55 प्रतिशत वोट यानी 3,19,436 वोट हासिल हुए थे। जो मार्जिन बहुत कम था। इसलिए भाजपा चाहती है कि जाट आरक्षण में हुड्डा का नाम बार-बार सामने लाने से ओमप्रकाश धनखड़ जाट मतदाता को भटका कार अपनी तरफ और मनीष ग्रोवर नॉन जाट को एकजुट कर अपनी तरफ मोड़ कर देशों से जातिगत फैक्टर को ब्रेक लगाने का काम करेंगे।

विरासत को आगे बढाने की है जिम्मेवारी है दीपेंद्र हुड्‌डा पर
हुड्डा परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता दीपेंद्र हुड्डा रोहतक लोकसभा क्षेत्र से 3 बार सांसद रह चुके हैं। उनके पिता भूपेंद्र सिंह हुड्डा व दादा रणबीर हुड्डा भी यहां से सांसद रहे हैं। रणबीर हुड्डा स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य थे। वे संयुक्त पंजाब में मंत्री भी रहे, जबकि भूपेंद्र हुड्डा लगातार 2 बार हरियाणा के सीएम रह चुके हैं। दीपेंद्र हुड्डा वर्ष 2005 में हुए उपचुनाव में सांसद चुने गए थे। यह क्षेत्र उनके पिता के सीएम बनने के बाद खाली हुआ था। दीपेंद्र हुड्डा बीटेक हैं और वे अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी से एमबीए कर चुके हैं।

क्या एक बयान पड़ गया भारी ?
जाट बनाम गैरजाट भावना के पीछे एक बड़ी वजह 2016 में हुआ जाट आंदोलन माना जाता है, जिसकी शुरुआत रोहतक से हुई और सोनीपत से लेकर पूरे जाट बहुल इलाकों में इसका उग्र रूप दिखाई दिया। इसमें जान और माल का काफी नुकसान हुआ। हरियाणा के सियासी पंडितों का मानना है कि 15 साल तक लगातार चले जाट राज के चलते गैरजाटों में जाटों के प्रति जो रोष था, उसे जाट आंदोलन ने एक तीखे आक्रोश में बदल दिया। इसके अलावा गैर जाटों में हुड्डा के प्रति नाराजगी का एक कारण बतौर सीएम दिया उनका एक बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं जाट पहले हूं, सीएम बाद में।

चौ. देवीलाल का अधूरा काम पूरा कर पाएंगे मनोहर!

हरियाणा की राजनीतिक राजधानी कहे जाने वाले जाट बहुल रोहतक संसदीय क्षेत्र से ज्यादातर कांग्रेस का कब्जा रहा यह सभी जानते हंै। बता दें कि रोहतक के गढ़ में विपक्ष यहां से दो बार जीता है, वह भी गठबंधन के सहारे।
भाजपा अपने दम पर यहां आजतक खाता नहीं खोल पाई थी। जाट हार्टलैंड कहे जाने वाली रोहतक लोकसभा सीट पर 1952 से अब तक 17 बार चुनाव हुए हैं। इनमें 11 बार कांग्रेस ने बाजी मारी है। रोहतक हरियाणा की एकमात्र लोकसभा सीट है, जिस पर हमेशा जाट जाति से ही सांसद बने हैं। यही नहीं, यहां उपविजेता भी जाट ही रहे हैं। रोहतक ने जिसे सिर पर चढ़ाया उसे अर्श पर पहुंचा दिया और जिसे छोड़ा उसे कभी उभरने नहीं दिया। यही कहानी ताऊ देवीलाल के साथ भी रही। देवीलाल को उप-प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने वाले व उन्हें जननायक की उपाधि दिलाने वाले रोहतक ने उन्हें राजनीति में उनसे कहीं नये भूपेंद्र हुड्डा के हाथों से लगातार तीन बार हरवाया भी। बाद में हुड्डा 10 साल सीएम रहे। दरअसल 1989 के लोकसभा चुनाव में देवीलाल ने रोहतक सहित एक साथ 3 लोकसभा क्षेत्रों राजस्थान के सीकर व पंजाब के फिरोजपुर से चुनाव लड़ा था। देवीलाल रोहतक व सीकर से जीते। चुनाव के बाद देवीलाल ने सीकर सीट की सदस्यता रखी ओर रोहतक से इस्तीफा दे दिया। इससे खफा रोहतक के लोगों ने लगातार 3 बार देवीलाल को यहां से लोकसभा चुनाव हराया और भूपेंद्र हुड्डा को जितवाया। हुड्डा के बाद इस सीट से 3 बार से उनके बेटे दीपेंद्र सांसद बनते आ रहे हैं। मगर इस बार मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और भजपा हाईकमान जिस रणनीति के तहत गढ़ तोड़ने में लगा है क्या वह इसमें कामयाब हो पाएंगे। यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे जाट आरक्षण की आग को भाजपा ने अभी तक जिस प्रकार जीवित रखा है और हुड्डा को उसके लपेटे में ले रही है, उससे कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि फुट डालो राज करो की यहां नीति कहीं सार्थक न हो जाए।

हुड्‌डा परिवार का गढ़ है रोहतक
रोहतक लोकसभा क्षेत्र को हुड्डा परिवार का गढ़ माना जाता है। हुड्डा परिवार 9 बार सांसद बना है। रणबीर हुड्डा 1952 तथा 1957 में सांसद बने। 1991, 1996, 1998 और 2004 में भूपेंद्र हुड्डा और 2005, 2009 तथा 2014 में दीपेंद्र हुड्डा सांसद बने। 1952 से लेकर 2014 तक हुए चुनाव में ज्यादातर समय जाट नेता ही सांसद बने हैं। इसमें भी 11 बार कांग्रेस जीती है। 1962, 1971 व 1999 और 1977, 1980 तथा 1989 में गैर कांग्रेसी प्रत्याशी को जीत हासिल हुई थी।

और गहरी हुई जातिगत खाई
कहावत है गैर जाटों में नाराजगी की भावना का एक प्रतिरूप कुछ समय पहले हरियाणा में हुए मेयर के चुनावों में भी दिखा। तब यहां पांच मेयरों के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने एक भी जाट को टिकट नहीं दिया और ये सारी सीटें बीजेपी निकालने में कामयाब रही। यह प्रयोग कामयाब रहने के बाद बीजेपी इसी एजेंडे पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। हालिया चुनाव में उसने बस दो जाट चेहरों को उतारा है। रोहतक के कारोबारी संदीप जैन का कहना था कि इस बार के चुनावों में जितना कास्ट फैक्टर दिखाई दे रहा है, उससे पहले यह कभी नहीं रहा। वहीं सोनीपत में वकालत करने वाले चौधरी चंद्रभान सिंह ने एक साक्षात्कार में स्वीकारते हुए कहा था हैं कि भाजपा सरकार के आने के बाद हरियाणा में जातिगत खाई गहरी हुई है।

जातीय समीकरण
इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा करीब सवा 6 लाख जाट वोटर, करीब 2 लाख 98 हजार अनुसूचित जाति के वोटर, करीब 1 लाख 70 हजार यादव वोटर, करीब 1 लाख 24 हजार ब्राह्मण वोटर और करीब 1 लाख 8 हजार पंजाबी वोटर हैं। जातिगत समीकरणों को देखते हुए ही कांग्रेस, इनेलो और जेजेपी-आप गठबंधन ने जाट प्रत्याशियों को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने ब्राह्मण प्रत्याशी पर भरोसा जताया है।

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