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किसका बिगड़ा समीकरण “बृजेन्द्र/दुष्यंत/भव्य”

मोदी लहर का “बृजेन्द्र” को होगा फायदा >5 साल के रिपोर्ट कार्ड से “दुष्यंत” की स्थिति मजबूत >भजन लाल की छवि और गैरजाट वोटों के साथ भव्य रेस में बरकरार

महेश मेहता | हिसार टुडे
हिसार लोकसभा चुनाव बेहद कांटे की टक्कर का मुकाबला माना जा रहा है सभी पार्टीयां खुद की जीत के दावे कर नए-नए आंकड़ों के साथ अपने पार्टी प्रत्याशी की जीत की घोषणा कर रही है। कुछ यही हाल इन दिनों हिसार लोकसभा चुनाव के दौरान भी देखने को मिल रहा है। बता दंे कि इस बार 3 मुख्य प्रत्याशियों के बीच जोरदार चुनावी रणसंग्राम होने की उम्मीद जताई जा रही है। जिसमें शामिल है भाजपा से केंद्रीय इस्पात मंत्री और भाजपा नेता बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेन्द्र सिंह (हरियाणा कैडर 1998 के आईएएस अफसर), कांग्रेस से आदमपुर के विधायक कुलदीप बिश्नोई के बेटे ऑक्सफोर्ड यूनिवसिर्टी से एमएससी पास आउट भव्य बिश्नोई और तीसरा दमदार मुकाबला है जननायक जनता पार्टी से खड़े मौजूदा सांसद दुष्यंत चौटाला जिन्होंने कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में बैचलर ऑफ साईंस इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में डिग्री प्राप्त की उनके बीच मानी जा रही है। मगर ऐसे कौन से फैक्टर हैं जो उनकी राह में मुसीबत या राह को आसान कर सकते हैं। यही जानने के लिए हिसार टुडे ने कुछ जानकारों से चर्चा के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है। आइये डालते हैं एक नजर कैसा होगा हिसार लोकसभा का चुनावी रंग।

दुष्यंत चौटाला के पक्ष में जाते पहलू

दुष्यंत चौटाला के पक्ष में यही बात जाती है कि वह ऐसे सांसद रहे हैं जिनकी चर्चा राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रही है। दुष्यंत के नाम जनहित के प्रश्न सबसे अधिक में उठाने का रिकॉर्ड दर्ज है। दुष्यंत का किसान का बेटा होने की छवि के कारण ग्रामीण इलाकों में दुष्यंत की अच्छी पकड़ है। दुष्यंत मृदुभाषी और बुजुर्गों का आदर सम्मान करने के कारण लोगों के बीच काफी मशहूर है। दुष्यंत ने किसानो की आवाज भी बुलंद की है चाहे ट्रैक्टर पर लगाए टैक्स का मुद्दा हो या किसानों की गिरदावरी और मुआवजे का मुद्दा। दुष्यंत की युवा और किसान वर्ग में लोकप्रियता उनको चुनाव में लाभ पहुंचायेगी। दुष्यंत का अपनी जनता के साथ अच्छा जनसम्पर्क है। मां नैना चौटाला के हरी चुनरी के माध्यम से महिलाओं का खासा वोटबैंक उनके साथ है। इतना ही नहीं जननायक जनता पार्टी बनने के बाद भी जाट मतदाता इनेलो से ज्यादा दुष्यंत के खेमे में अधिक नजर आ रहे हैं। इतना ही नही आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का लाभ भी दुष्यंत को चुनाव में मिलेगा। इस बार दुष्यंत अपने 5 साल का रिपोर्ट कार्ड लेकर चुनाव में उतर रहे हैं। उन्होंने अपनी सांसद की निधि भी शहर के विकास में खर्च की है। जिसको देखकर लगता है कि वो टक्कर में सबसे अव्वल है। पिछली बार दुष्यंत चौटाला को सिर्फ उचाना, उकलाना और नारनौंद में ही जीत हासिल हुई थी। इस बार गैर जाट वोटरों के बिखराव का फायदा उनको नलवा, हांसी, बवानीखेड़ा और बरवाला में भी होता नजर आ रहा है।

दुष्यंत चौटाला के खिलाफ जाते पहलू
बता दें कि इस बार दुष्यंत के खिलाफ सिर्फ एक ही बात जाती है और वह है इनेलो पार्टी से दो फाड़ होकर बनायी नयी पार्टी जननायक जनता पार्टी के उम्मीदवार बनकर चुनाव में उतरेंगे। इनेलो पार्टी ने अपना प्रत्याशी भी चुनाव में खड़ा किया है। जिसके चलते ऐसा माना जा रहा है कि इस बार पिछली बार की तुलना में उनके वोट कटेंगे। इतना ही नहीं ऐसा माना जा रहा है कि इनेलो इस बार किसी भी कीमत पर दुष्यंत को हराने की पूरी कोशिश करेगी। इतना ही नहीं दुष्यंत जाट उम्मीदवार है और भाजपा ने भी जाट उम्मीदवार के तौर पर बृजेन्द्र को चुनाव में खड़ा करके मजबूत दांव खेला है। माना जा रहा है कि जिस जाट मतों के आसरे दुष्यंत बैठे थे अब उनके वोट भाजपा प्रत्याशी काटेंगे, जिसका खामियाजा दुष्यंत को चुनाव में उठाना पड़ेगा।

भव्य बिश्नोई को मिलेगा स्वर्गीय भजन लाल के कार्यों का आशीर्वाद
स्वर्गीय भजन लाल के नाम पर भव्य को इस बार वोट मिल सकते हैं। पिता और मां के विधायक होने के नाते भी इसका फायदा भव्य को मिलता दिखाई दे रहा है। जातिगत फैक्टर देखें तो भाजपा और जजपा ने जाट प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। जिस वजह से जाट मतदाता विभाजित होने के कारण गैरजाट उम्मीदवार भव्य को इसका लाभ मिलेगा। वैसे बिश्नोई समाज के कट्टर वोट भी भव्य को मिलने की उम्मीद है। इस बार भव्य बिश्नोई कांग्रेस के निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं, जिनका उन्हें असरदार फायदा होगा। जाट वोट बिखरने का लाभ होगा, सावित्री जिंदल से मजबूत रिश्ते होने का फायदा भी भव्य बिश्नोई को चुनाव में मिलेगा। युवा वर्ग में उनकी अच्छे फॉलोवर्स का लाभ भी भव्य को होगा।

भव्य बिश्नोई के खिलाफ जाते पहलू
भव्य बिश्नोई को सबसे ज्यादा खामियाजा इस बात से उठाना पड़ सकता है कि वह भी जनता के बीच और उनके मुद्दे उठाते हुए इन 5 सालों में ज्यादा एक्टिव नहीं नजर आये। गैर जाट मतों की अगर बात करंे तो अगर वह भाजपा प्रत्याशी बृजेन्द्र सिंह के पाले में गए तो भव्य को इसका बहुत नुक्सान उठाना पड़ सकता है। 5 साल में पिता कुलदीप बिश्नोई की कम सक्रियता भी भव्य को चुनाव में नुक्सान पंहुचा सकती है। कुलदीप बिश्नोई से लोगों की नाराजगी उन्हें भारी पड़ सकती है। पिता और मां का विधानसभा में खराब ट्रैक रिकॉर्ड उनको नुक्सान पहुचायेगा। साथ ही भजनलाल परिवार की तीसरी पीढ़ी का चुनाव में उतरने से वंशवाद के आरोप में भव्य को चुनाव में इसका नकरात्मक प्रभाव पड़ेगा। मेयर चुनाव में भाजपा के पंजाबी उम्मीदवार गौतम सरदाना को चुनाव में सहयोग न करने के कारण भी पंजाबी समाज का वोट भी बंट सकता है। अगर ऐसा हुआ तो भव्य को इसका बहुत नुक्सान उठाना पड़ेगा।

बृजेन्द्र सिंह के पक्ष में जाते पहलू
चाहे कोई कुछ भी कह ले, मगर यह हकीकत है कि जमीनी स्तर पर अभी भी हवा मोदी के राज की चल रही है। पीएम मोदी शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों का दिल जीतने में कामयाब हुए हैं। 2014 की ही भांति इस बार 2019 में मोदी लहर का परिणाम चुनाव में हावी दिखाई देगा। यही कारण है कि भाजपा प्रत्याशी बृजेन्द्र सिंह को चुनाव में इसका बहुत बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। क्योंकि यह वोट केंद्र में मोदी की सत्ता आने के लिए दिया जायेगा। इतना ही नहीं चुनाव के पहले और बाद में सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा चुनाव मंच में गूंजता रहा, उसे भी देशभक्ति के साथ जोड़कर देखा जा रह रहा है। यही देशभक्ति वोटों का काम कर रही है। इतना ही नहीं सर छोटूराम के खानदान से आने के कारण बृजेन्द्र सिंह पर जाट मतदाता मेहरबान होंगे। मां प्रेमलता के विधायक होने के नाते भी एक बहुत बड़ा वोट बैंक बृजेन्द्र के पक्ष में जा सकता है। साथ ही भाजपा की गैर जाट नेता भी लोगों के वोट भाजपा की तरफ मोड़ने का काम करेंगे। जींद उपचुनाव और मेयर चुनाव में भाजपा की लहर से भी यह चुनाव अछूता नहीं रह गया है। माना जाता है कि बृजेन्द्र सिंह की टिकट पीएम मोदी के पास से डायरेक्ट आने के कारण भी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की नजर यहां टिकी है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला का यहां बराबर मॉनिटर चल रहा है। इतना ही नहीं बृजेन्द्र सिंह आईएएस अफसर हैं, इसलिए आईएएस अफसर का रुझान और उनके वोट भी कहीं न कहीं बृजेन्द्र सिंह को फायदा पहुंचायेंगे। इतना ही नहीं उनकी मां के हलके उचाना के अलावा उन्हें हिसार, हांसी, बरवाला, भवानीखेड़ा और उकलाना से वोट मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। अगर सभी समीकरणों पर नजर दौड़ाएं तो भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू हैं।
बृजेन्द्र सिंह के खिलाफ जाते पहलू
बृजेन्द्र सिंह के खिलाफ जाती सबसे पहली बात है कि हिसार लोकसभा की जनता उनको जानती भी नहीं। यहां के लोगों से 5 सालों में वे कभी ज्यादा मिलते दिखाई नहीं दिए। उनकी पहचान सिर्फ अपने पिता और मां के कारण है। खुद बृजेन्द्र सिंह को भाजपा के कार्यकर्ता भी नहीं जानते। अपरिचित उम्मीदवार को हिसार की जनता पर थोपने का खामियाजा भी बृजेन्द्र सिंह को उठाना पड़ सकता है। विपक्ष के हमलावर तेवर का जवाब देने में बृजेन्द्र सिंह कहीं न कहीं कमजोर माना जा रहा है। बृजेन्द्र सिंह के मां-पिता दोनों राजनीतिक क्षेत्र में है। यही कारण है कि उन पर परिवारवाद और वंशवाद का आरोप लग रहा है जो उनके खिलाफ जा सकता है। इतना ही नहीं उचाना में बड़े वोटबैंक को छोड़कर बाकी जगह उन्हें मोदी लहर में आये वोटों के आसरे ही बैठना पड़ेगा। साथ ही किसान की नाराजगी भी उनके लिए मुसीबत बन सकती है। इतना ही नहीं उनके पास सिवाय आईएएस के काम के अलावा कोई काम गिनाने के लिए नहीं है।

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