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Today News |पिता ने देखा सपना, बेटे ने किया साकार

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इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में चल रहे 18 वें एशियन गेम्स में देश के लिए पहला गोल्ड मेडल जीतने वाले हरियाणा के पहलवान बजरंग पूनिया पर आज पूरा हरियाणा ही नहीं देश गर्व कर रहा है। जकार्ता की हाल की यादों पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो बजरंग पुनिया ने पुरुष 65 कि.ग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती की खिताबी बाऊट में जापान के दाइची ताकातानी को पराजित कर भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया। बजरंग पुनिया ने लगातार 3 स्वर्ण पदक अपने नाम किए हैक। इसके पहले बजरंग पुनिया ने गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में, जार्जिया में तबलिसी ग्रां.प्री. और इस्तांबुल में यासर दोगु अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खिताब जीता था । गौरतलब है की बजरंग पूनिया को यह इनाम अठारहवी एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने पर दिया जा रहा है।

ऐसे बना पहलवान

हरियाणा के झज्जर जिले के खुड्डन गांव में रहने वाले बलवान पुनिया एक शौकिया पलवान थे। गांव के आस पास होने वाले दंगल में वो अक्सर जाया करते थे। बलवान की आदत थी कि वो अपने दो बेटों हरेंद्र और बजरंग को दंगल दिखाने ले जाया करते थे। बलवान को कुश्ती से इतना प्यार था कि उन्होंने ठान लिया कि अब अपने दोनों बेटों में से किसी एक को उन्हें पहलवान ही बनाना है। हरेंद्र को तो इस खेल में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी लेकिन बजरंग ने पिता के कहे को कुछ ज्यादा ही सीरियस ले लिया। शुरुआत में तो बजरंग गांव के अखाड़े में सिर्फ स्कूल से बचने के लिए जाते थे लेकिन फिर बाद में अखाड़े की मिट्टी में ही बजरंग को अपने सपने दिखने लगे लेकिन सपनों को साकार करने के लिए उनके सामने बहुत अड़चने आईं, खासकर पैसों की। बजरंग की पढ़ने में कोई खास रुचि तो थी नहीं इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान पहलवानी पर ही दिया। क्योंकि ये बहुत ही सस्ता खेल है तो बजरंग को कोई दिक्कत भी नहीं थी. बजरंग के अनुसार उनको इस खेल में मजा इसलिए भी आता था क्योंकि अखाड़े में वो बस एक लंगोट पहन कर जाते थे, वहां कुश्ती करके खूब पैसे ले आते थे और फिर बढ़िया खाते थे।

मतलब कुछ लेकर नहीं जाना, पर वहां से कुछ न कुछ लेकर जरूर आना। 11 साल की उम्र में बजरंग ने छारा गांव में विरेंद्र के अखाड़े में जाना शुरू कर दिया जो कि उनके गांव से 35 किलोेमीटर दूर था। उस अखाड़े में ही पहली बार उन्होंने मैट देखा, इससे पहले हमेशा से वो मिट्टी में ही कुश्ती करते आए थे। 2008 तक वो उसी अखाड़े में रहे, फिर उसके बाद परिवार सोनीपत में शिफ्ट हुआ और बजरंग महाबली ‘सतपाल के अखाड़े’ में पहुंच गए। बहुत जल्द ही बजरंग ने खेल के प्रति अपने समर्पण और मेहनत से, अखाड़े के बड़े पहलवानों को चित कर दिया। तब बजरंग पुनिया की मुलाक़ात हुई उनके गुरू योगेश्वर दत्त से।

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