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1900 सालों से ज्यादा पुराना है कैमूर का मुंडेश्वरी माता मंदिर, यहां दी जाती है सात्विक बलि

मंदिर में बलि देने की है सात्विक परंपरा

हिसार टुडे 

भारत में देवी के कई प्राचीन मंदिर हैं। सभी की अपनी-अपनी विशेषता है। बिहार के कैमूर जिले में ऐसा ही एक मंदिर है, जिसे लोग मुंडेश्वरी माता मंदिर के नाम से जानते हैं। इस मंदिर को देवी के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह मंदिर 1900 साल से भी अधिक पुराना है। इस मंदिर की दूसरी खास बात है यहां दी जाने वाली सात्विक बलि। तीसरी खास बात जो इस मंदिर की है, वो यह है कि इस मंदिर का संरक्षक मुस्लिम परिवार है।

हजारों साल पुराना है मंदिर का इतिहास

पटना आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर अतुल कुमार वर्मा के अनुसार, यह मंदिर कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर परिसर में विद्यमान शिलालेखों से इस मंदिर की ऐतिहासिकता प्रमाणित होती है। 1868 से 1904 ई. के बीच कई ब्रिटिश विद्वान् व पर्यटक यहां आए थे। मंदिर का एक शिलालेख कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में है। यह शिलालेख 349 ई. से 636 ई. के बीच का है। यहां लगभग 1900 सालों से लगातार पूजा हो रही है। इस मंदिर का उल्लेख कनिंघम ने भी अपनी पुस्तक में किया है। मंदिर की प्राचीनता का आभास यहां मिले महाराजा दुत्‍तगामनी की मुद्रा से भी होता है, जो बौद्ध साहित्य के अनुसार अनुराधापुर वंश का था और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका का शासक रहा था।

मुंडेश्वरी माता मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां दी जाने वाली सात्विक बलि। अर्थात यहां बलि में बकरा चढ़ाया जाता है, लेकिन उसका जीवन नहीं लिया जाता।

जब बकरे को माता की मूर्ति के सामने लाया जाता है तो पुजारी अक्षत (चावल के दाने) को मूर्ति को स्पर्श कराकर बकरे पर फेंकते हैं। बकरा उसी क्षण अचेत, मृतप्राय सा हो जाता है।थोड़ी देर के बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया फिर होती है तो बकरा उठ खड़ा होता है और इसके बाद ही उसे मुक्त कर दिया जाता है। मंदिर के केयर टेकर अजहरउद्दीन ने बताया कि सालों से मुंडेश्वरी माता मंदिर का संरक्षक एक मुस्लिम परिवार है।

दुर्गा का वैष्णवी रूप ही मां मुंडेश्वरी के रूप में यहां प्रतिस्थापित है। मुंडेश्वरी की प्रतिमा वाराही देवी की प्रतिमा है, क्योंकि इनका वाहन महिष है। मुंडेश्वरी मंदिर अष्टकोणीय है। मुख्य द्वार दक्षिण की ओर है। मंदिर में शारदीय और चैत्र माह के नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। वर्ष में दो बार माघ और चैत्र में यहां यज्ञ होता है। 1968 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ की 97 दुर्लभ मूर्तियों को सुरक्षा की दृष्टि से पटना संग्रहालय में रखवा दिया। तीन मूर्तियां कोलकाता संग्रहालय में हैं।

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