धर्मकर्म

गुरु की कही बात ईश्वर भी नहीं काटता

हेमंत पाटिल | रिलिजन डेस्क

एक बार की बात एक संत थे। जो बहुत ही साधारण तरीके से अपना जीवन निर्वाह करते थे ,पर वह बहुत उच्च कोटि के थे। उनके पास 7-8 शिष्य रहते थे। उनमें से एक शिष्य उनके बताए रास्ते पर चलता था। और संत उस शिष्य से बहुत स्नेह रखते थे। धीरे-धीरे उस शिष्य की ख्याति भी बढ़ने लगी और सभी लोग उसकी मिसाल देने लगे की शिष्य हो तो ऐसा। और इन सबसे संत बहुत खुश होते थे। एक दिन शिष्य ने संत से कहा कि में कुछ समय एकांत में भक्ति करना चाहता हूँ। तो संत ने कहा तुम यहाँ रह के भी भक्ति कर सकते हो और जैसा तुम उचित समझों।

शिष्य ने गुरु से इजाजत ली और जंगल की और एकांत में निकल गया। ठीक दस साल बाद वह शिष्य अपने गुरु से वापस मिलने आया । सब को मालूम पड़ने पर भीड़ इक्क्ठा ही गयी। और शिष्य की खूब तारीफ हुई और वह शिष्य की चर्चा सभी जगह चल रही थी । संत भी अपने प्यारे शिष्य से मिलकर बहुत खुश थे। वो शिष्य ने कुछ अदभुत कारनामे भी करें तो वह प्रचलित हो गया। सब जगह शिष्य की चर्चा होने लगी। और दुर- दूर से लोग उससे मिलने आने लगे। इधर संत को चिंताए सताने लगी। एक दिन गुरु और सभी शिष्यों को पास ही एक गांव में जाना था। रास्ते में एक नदी पड़ती थीं।

उस नदी को पार करने के लिए नाव से जाना पड़ता था। गुरु और सभी शिष्य नाव का इंतजार कर रहे थे और गाँव के भी बहुत सारे लोग थे। उस शिष्य ने गुरु से कहा कि हम क्यों ना हम पानी पर चल कर नदी पार कर लें। इस पर गुरु ने कहा-पानी पर कैसे चल सकते है सब डूब जायेंगे। इतने में शिष्य पानी की और बढ़ा और पानी पर चलने लगा और उसने सबको कहा कि तुम भी आ जाओ। पर किसी की हिम्मत नहीं हुई। शिष्य को पानी पर चलता देख कर सब हैरत में पड़ गए। और शिष्य की वाहवाही होने लगी। शिष्य ने पानी पर चलकर नदी पार कर ली। और गुरु और बाकी शिष्य ने नाव में बैठकर नदी को पार किया। सभी शिष्यों ने अपने गुरु की चिंता को पढ़ लिया था। जब वापस अपनी कुटिया में सब आ गये तो शिष्यों ने गुरु से कहा की आपके शिष्य ने आपका नाम रोशन कर दिया और आप खुश नजर नहीं आ रहें हैं। इतने में वह शिष्य भी वहाँ आ गया और बोला गुरूवर मुझसे कोई गलती हुई हो तो बताइये। गुरु ने कहा – नहीं कोई गलती नही हुई हैं।

शिष्य बोला-या तो मेरी प्रसिद्धि से आपको कोई परेशानी हैं, क्योंकि आपके चेहरे से साफ झलक रहा है, की आप परेशान हैं। संत ने कहा -में बोलना नहीं चाहता था पर तुमने यह कहकर मुझे मजबूर कर दिया। संत ने शिष्य से कहा -तुमने जो पानी पर चलकर नदी पार करी तुम्हें बहुत महँगी पड़ी। शिष्य बोला कैसे – मैंने तो नदी फ्री में पार कर ली और मुझे इज्जत भी मिली । गुरु ने हँस कर कहा– जो चीज मात्र पाँच रुपये में पार की जा सकती थी ,उसके लिए तुमने अपने दस साल की भक्ति उस चीज में लगा दी। तुमने जरा सी सिद्धि के पीछे अभी तक के किये तप-त्याग को बर्बाद कर लिया। और अपनी भक्ति का सौदा कर लिया और ईश्वर के मिलन के सारे रास्ते बंद कर लिए। ये सुनकर शिष्य गुरु के चरणों में गिर पड़ा और दहाड़ मारकर रोने लगा। गुरु को उस पर दया आ गयी। उन्होंने उसे अपने पास रख लिया पर वो अपने जीवन का अमूल्य समय और तपस्या को खो चुका था।

देखा दोस्तों जरा सी सिद्धि या महान बनने के लालच में उस शिष्य ने अपनी भक्ति को खत्म कर लिया। हमेशा अपने गुरु की कही बात पर चलो अपने मन से कुछ मत करो। क्योंकि की गुरु की कही बात पत्थर की लकीर है, उसे ईश्वर भी नहीं काटता। ईश्वर सबको अपने गुरु के मार्ग पर चलने का जज्बा दें।।

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