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समय के अनुसार बदलते रहती हैं धार्मिक प्रथाएं

हिसार टुडे | अध्यात्म डेस्क
प्रथा तथा रीति रिवाज समय और समाज की ज़रूरत के अनुसार बदलते रहते हैं। पहले साधक प्रातः ब्रह्म महूर्त में या सूर्योदय के समय, दोपहर, तथा सूर्यास्त के समय लगभग अनिवार्य तौर से ध्यान लगा कर किसी ना किसी मंत्र का जाप करते थे, या मूर्तियों की पूजा अर्चना तथा आरती करते थे, हवन आदि करते थे। समय के अभाव के कारण आज कल यह प्रथायें या तो लुप्त हो चुकी हैं या संशोधित कर के संक्षिप्त रूप में करी जाती हैं। सब कुछ स्वेच्छिक है।
किसी भी प्रथा या रीति रिवाज को जब मन और श्रद्धा से किया जाये तो वह उनुकूल वातावर्ण उत्पन्न करने में सहायक हैं। साधक आसानी से अपने को मन वाँछित दिशा में केन्द्रित कर सकता है तथा दैनिक गतिविधियों से अपने आप को अलग कर के ईश्वरीय शक्ति का आभास महसूस कर सकता है। यह मनोवैज्ञानिक क्रिया है। पूजा अर्चना के रीति रिवाजों में दो तरह के नित्य-नियम हैं जिन्हें दैनिक नित्य-नियम और घटना प्रधान विधान कह सकते हैं । दैनिक नित्य-नियम के विधान निजि सान्त्वना के लिये होते हैं। घटना प्रधान विधान किसी विशेष घटना के घटित होने के घटित होने पर किये जाते हैं।
रीति रिवाजों का प्रावधान सभी मानव समाजों में तथा धर्मों में किसी ना किसी रूप में है। थोडा बहुत अन्तर स्थानीय भूगौलिक, आर्थिक तथा राजनैतिक कारणों से है। हिन्दू राति रिवाज सरल, आसान तथा परिवर्तनशील हैं। उन्हें समय तथा आवश्यक्तानुसार बदला जा सकता है। समाज हित में रीजि रिवाजों को बदलने की क्रिया सर्व सम्मति अथवा बहु सम्मति से होनी चाहिये, व्यक्तिगत सुविधा के लिये नहीं।

पूर्वजों की पूजा मान्यताएं

संध्या, होम तथा पूजा स्वेच्छिक, व्यक्तिगत दैनिक नित्यक्रम हैं। उपासक किसी भी स्थान को चुन कर अपनी समय, साधनों तथा सुविधानुसार सभी या कुछ दैनिक नित्यक्रमों को कर सकता है। यह दैनिक नित्यक्रम ऐकान्त में या सार्वजनिक स्थल पर अकेले या परिवार के साथ कर सकते हैं। नित्यक्रम मन्दिर, सामाजिक केन्द्र, पार्क या किसी भी मनचाहे स्थान पर किया जा सकता है। उल्लेखनीय बात यह है कि यह दैनिक नित्यक्रम निजि संन्तुष्टि के लिये हैं जिस से दूसरों को असुविधा नहीं होनी चाहिये। व्यक्तिगत दैनिक नित्यक्रम का विधान केवल सुझाव मात्र है जिसे सुविधानुसार बदला जा सकता है। संध्या – संध्या का लक्ष्य अपनी इच्छानुसार किसी स्वच्छ और पवित्र स्थान पर शान्ति से बैठ कर ईश्वर का समर्ण करना है। किसी भी दिशा की ओर मुँह किया जा सकता है क्यों कि ईश्वर तो सर्व-व्यापक है। साधारणत्या उचित समय प्रातः सूर्योदय से पहले और सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात का है जव कि दैनिक गतिविधियाँ पूर्ण हो चुकी हों। उपासक ईश्वर का धन्यवाद चाहे तो मूक रह कर केवल मन से, चाहे तो धीरे से, या लाऊडस्पीकर लगा कर मनचाही भाषा में, गद्य, पद्य, मंत्रोच्चारण कर के, या गीत गा कर भी कर सकता है।

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