धर्मकर्म

नीलांचल पर्वत पर विराजमान है मां कामाख्या

दस महाविद्या विराजित हैं मां काम्ख्या के मंदिर में

गुवाहाटी के कामाख्या शक्तिपीठ में देवी मां 64 योगिनियों और दस महाविद्याओं के साथ विराजित हैं। ये दुनिया की इकलौती शक्तिपीठ है, जहां दसों महाविद्या- भुवनेश्वरी, बगला, छिन्नमस्तिका, काली, तारा, मातंगी, कमला, सरस्वती, धूमावती और भैरवी एक ही स्थान पर विराजमान हैं। कामाख्या शक्तिपीठ गुवाहाटी (असम) के पश्चिम में 8 कि.मी. दूर नीलांचल पर्वत पर है। माता के सभी शक्तिपीठों में से कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम माना जाता है। इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है। मंदिर में एक कुंड सा है, जो हमेशा फूलों से ढ़का रहता है। इस जगह से पास में ही एक मंदिर है जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है। यह पीठ माता के सभी पीठों में से महापीठ माना जाता है।

ऐसे बना कामाख्या शक्तिपीठ

देवी पुराण के अनुसार माता सती ने अपने पिता के यज्ञ कुंड आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद भगवान शिव माता के शरीर को उठाकर विनाश नृत्य करना आरंभ कर दिया था। शिवजी के तांडव की वजह से संपूर्ण सृष्टि के विनाश का संकट खड़ा हो गया है। इस संकट को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र की मदद देवी सती की देह के टुकड़े-टुकड़े कर किए।
जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वो स्थान शक्तिपीठ बन गए। कामाख्या शक्तिपीठ पर माता सती का गुह्वा मतलब योनि भाग गिरा था। इस कारण कामाख्या महापीठ की उत्पत्ति हुई। कहा जाता है यहां देवी का योनि भाग होने की वजह से साल में एक बार तीन दिन के लिए माता रजस्वला होती हैं। इस दौरान यहां अम्बूवाची मेला आयोजित होता है।
ये मेला हर साल जून में लगता है। इन तीन दिनों में मंदिर को बंद कर दिया जाता है। तीन दिनों के बाद मंदिर को बहुत ही उत्साह के साथ खोला जाता है।

क्यों कहते हैं अम्बूवाची
अम्बुबासी मेला को अम्बुबाची नाम से भी जाना जाता है। अम्बुवाची शब्द अंबु और बाती दो शब्दों के मेल से बना है जिसमें अंबु का अर्थ है पानी जबकि बाची का अर्थ है उतफूलन।
यह स्त्रियों की शक्ति और उनकी जन्म क्षमता को दर्शाता है। यह मेला हर साल यहां मनाया जाता है जिसको महाकुंभ भी कहा जाता है।
मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है। यहां सैकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं।
प्रसाद के रूप में भक्तों को दिया जाता है गीला वस्त्र
मंदिर में भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं। कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछाया जाता है।
तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल हो जाता है।

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