धर्मकर्म

कर्म बांधता है धर्म मुक्त करता है

Hisar Today

कर्म बहुत जरुरी है। यहां तक कि अगर आप चाहें तो भी कर्म करने से खुद को रोक नहीं सकते। कर्म से मतलब सिर्फ शारीरिक क्रिया से ही नहीं है। आप शरीर से कर्म करते हैं, मन से कर्म करते हैं, अपनी भावना से कर्म करते हैं, यहां तक कि आप अपनी ऊर्जा के स्तर पर भी कर्म करते हैं। हर वक्त आप शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक क्रियाएं करते रहते हैं।कर्म अनिवार्य है। किसी भी हालत में कर्म तो आपको करना ही है, चाहे आप आराम ही क्यों न कर रहे हों। आराम के दौरान भी आप अपने मन या भावना में कुछ न कुछ कर ही रहे होते हैं।

क्या आपको लगता है कि आपके भीतर कर्म न करने की क्षमता है? चाहे कर्म करने की आपकी इच्छा हो या न हो, आप किसी न किसी रूप में कर्म कर ही रहे होते हैं। लेकिन होता यह है कि लोग पूरे दिन जो भी काम करते हैं, उनमें से ज्यादातर कर्म फल की इच्छा द्वारा संचालित होते हैं। आमतौर पर लोगों के मन में बड़े पैमाने पर यही चल रहा होता है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, उससे उन्हें क्या मिलेगा। कृष्ण इस श्लोक में कह रहे हैं कि इस तरह से जीना व्यर्थ है, क्योंकि अगर आप परिणाम को ध्यान में रखकर कोई भी काम करते हैं, तो वह क्रियाकलाप आपका कर्म बन जाता है और आपके बंधन का कारण बनता है। दूसरी तरफ यदि आप अपने लाभ के बारे में सोचे बिना कोई काम कर रहे हैं यानी आप उसे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उसे किए जाने की जरूरत है, तो ऐसी स्थिति में वही क्रियाकलाप धर्म बन जाता है। यहां धर्म का मतलब कर्तव्य समझा जाता है, हालांकि यह पूरी तरह से कर्तव्य नहीं है। क्योंकि कर्तव्य शब्द अपने आप में बहुत सीमित है, जबकि धर्म, कर्तव्य से कहीं ज्यादा व्यापक अर्थ रखता है।

धर्म और कर्म में केवल एक ही अंतर है। धर्म मुक्त करता है, जबकि कर्म बंधन पैदा करता है। तो कर्म तो अनिवार्य है। किसी भी हालत में कर्म तो आपको करना ही है, चाहे आप आराम ही क्यों न कर रहे हों। आराम के दौरान भी आप अपने मन या भावना में कुछ न कुछ कर ही रहे होते हैं। अब यह आपको देखना है कि आप अपने आपको उलझाने के लिए कर्म कर रहे हैं या मुक्त करने के लिए?यहां कृष्ण आपको एक आसान सी युक्ति दे रहे हैं जिससे आप अपनी छोटी-मोटी गतिविधियों का इस्तेमाल भी अपनी मुक्ति के लिए कर सकते हैं। यह सबसे ज्यादा मशहूर श्लोक इसीलिए है क्योंकि यही दुनिया का सबसे बड़ा दुख है कि लोग एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रह सकते। लोग बीमार इसीलिए होते हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि स्थिर कैसे हुआ जाए। अगर आप अपने आप को पूरी तरह से स्थिर या विश्राम की स्थिति में ला सकते हैं, तो बीमारी नाम की कोई चीज ही नहीं होगी।

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