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कर्ण ने ही शुरू की थी पितृपक्ष की परंपरा

Hisar Today

अभी पितृपख चल रहा है जो 9 सितंबर को समाप्त होगा। श्राद्ध पर्व कर्ण को लेकर एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुंची तो उन्हें खाने के लिए बहुत सारा सोना और गहने दिए गए। कर्ण की आत्मा को कुछ समझ नहीं आया। तब उन्होंने देवता इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया गया।

कर्ण को वापस भेजा धरती

देवता इंद्र ने कर्ण को बताया कि तुमने अपने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना ही दान दिया। कभी अपने पूर्वजों को खाना दान नहीं किया। तब कर्ण ने कहा कि मुझे अपने पूर्वजों के बारे में पता नहीं था इसी वजह से मैं उन्हें कुछ दान नहीं कर पाया।

इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और 16 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया। तर्पण किया, इन्हीं 16 दिन की अवधि को पितृ पक्ष कहा गया। एेसा माना जाता है कि कर्ण की यह पौराणिक कथा सुनने पर पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः

पितृ पक्ष अपने कुल, परंपरा और पूर्वजों के श्रेष्ठ कार्यों को याद करने और उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेने का समय है। इसमें व्यक्ति का पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया ‘तर्पण’ यानी जलदान और ‘पिंडदान’ यानी भोजन का दान श्राद्ध कहलाता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कार उसका पुत्र ही करता है। शास्त्रों के अनुसार, पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं- पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः।

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