टुडे न्यूज़टुडे विशेषराजनीतिहरियाणा

प्रदेशाध्यक्ष के बाद अब “नेता प्रतिपक्ष” के नाम को लेकर भी कांग्रेस में घमासान

एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के चाणक्य हरियाणा में दुबारा से विपक्ष को विधानसभा में ढेर करने के पीछे लगे है तो ठीक दूसरी तरफ कांग्रेस अब भी एक्शन के मोड़ में नजर नहीं आ रही है।

हिसार टुडे ।
एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के चाणक्य हरियाणा में दुबारा से विपक्ष को विधानसभा में ढेर करने के पीछे लगे है तो ठीक दूसरी तरफ कांग्रेस अब भी एक्शन के मोड़ में नजर नहीं आ रही है। क्योंकि अब तक कांग्रेस के अंदर प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर घमासान के बादल थमने का नाम ही नहीं लिए थे कि अब कांग्रेस के सामने दूसरी सबसे बड़ी समस्या है नेता प्रतिपक्ष पद की। बता दे कि इस बार हरियाणा में लोकसभा चुनाव की हार के बाद दुबारा से पार्टी प्रदेशाध्यक्ष पद और अब नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर टकराव होता जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष का यह पद भले कुछ महीनो के लिए हो। मगर इस पद का फायदा उन्हें विधानसभा चुनाव में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर साबित करने में मददगार साबित होगा। जैसा की आपको भी इस बात का अंदाजा है कि इनेलो में दो फाड़ के बाद इनेलो के हाथो से नेता प्रतिपक्ष का पद जा चूका है। मगर अब यह पद कांग्रेस की झोली में जा चूका है। शायद आपको याद हो लोकसभा चुनाव के पहले किरण चौधरी ने नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर चिट्ठी दी थी, उसके बाद कांग्रेस पार्टी के अंदर काफी बवाल हो गया था। इसलिए अब दुबारा इस पद को लेकर कांग्रेस के अंदर टकराव का नुक्सान पार्टी हाईकमान से लेकर प्रदेश में दिखाई देने की उम्मीद जतायी जा रही है।

नेता प्रतिपक्ष वही होगा जिसके सर पर होगा हुड्डा का हाथ

माना जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष पद पर लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी ने गुपचुपा तरीके से अपनी दावेदारी का पात्र विधानसभा सचिव को दिया था, लेकिन विधानसभा सचिवालय ने इस दावेदारी पर ही सवाल उठाते हुए कहा था कि इसके लिए उन्हें पार्टी के तमाम विधायकों का समर्थन का पत्र देना होगा। किरण चौधरी को लगा था कि विधायक दल की नेता होने के नाते उन्हें किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी। मगर जब सचिवालय से ऐसा कहा गया तो किरण चौधरी के मंसूबो पर पानी फिर गया। बता दें कि किरण चौधरी हुड्डा समर्थक गुट की नहीं मानी जाती है। ऐसे में किरण को पता था कि कांग्रेस की आपसी लड़ाई के चलते किरण चौधरी कांग्रेस विधायकों का समर्थन पत्र हासिल नहीं कर सकती। इसलिए पद खाली पड़ा हुआ है। माना जाता है कि सिर्फ जिस के सर पर हुड्डा का हाथ हो उसी को नेता प्रतिपक्ष का पद मिल सकता है। जैसा की आपको पता है कि हाल में भूपेंद्र हुड्डा ने दिल्ली आवास में बैठक ली थी जिसमें सभी विधायक शामिल हुए थे। ऐसे में यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद अशोक समर्थक गए गटो को हाथ मलते रहना पड़ा।

हुड्डा खुद बनेंगे नेता प्रतिपक्ष या गीता भुक्कल को मिलेगा मौका

बता दें की इस बात को लेकर चर्चा के बाजार गर्म है कि वैसे तो हरियाणा में अक्टूबर महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए भाजपा इस बात को लेकर भाजपा हड़बड़ी में कि अगस्त को जल्द से जल्द विधनसभा का विशेष सत्र बुलाया जाये। ताकि वह महत्वपूर्ण फैसला और घोषणाएं कर सके।इस बैठक में नेता प्रतिपक्ष को लेकर भी चर्चा होगी। यही कारण है कि इसके पूर्व दिल्ली में हुड्डा की हुयी बैठक ने कई संकेत दे दिए है। विधानसभा के विधायकों को हुड्डा पर भरोसा है. हो सकता है कि वह ऐसे समय में हुड्डा को ही नेता प्रतिपक्ष पद देने की सिफारिश करे अन्यथा किरण चौधरी के खिलाफ हुड्डा अपनी गुट की सबसे शिक्षित महिला नेत्री जो 2005 में कैबिनेट मंत्री भी रही अर्थात गीता भुक्कल को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौपी जा सकती है।

इनेलो के विधायकों के टूटने की वजह से अभय सिंह चौटाला की विपक्ष के नेता की कुर्सी गयी

बता दें कि इनेलो के पास 19 विधायक हुआ करते थे। चार इनेलो विधायकों के जननायक जनता पार्टी को समर्थन देने, चार के भाजपा व कांग्रेस में शामिल हो जाने तथा दो विधायकों के देहावसान की वजह से अभय सिंह चौटाला की विपक्ष के नेता की कुर्सी चली गई। अभय चौटाला इनेलो विधायक दल के नेता हैं। कांग्रेस विधायकों की संख्या 17 है, जो इनेलो के नौ विधायकों से दोगुनी के करीब है। ऐसे में विधानसभा स्पीकर ने विपक्ष के नेता का पद कांग्रेस को आफर कर रखा है।

क्या कुलदीप बिश्नोई, किरण चौधरी, रेणुका या रणदीप का लगेगा नंबर

माना जा रहा है की हुड्डा समर्थक उसी विधायक को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए इच्छुक है जो किसी गट का न हो. ऐसे में हुडडा समर्थको की छोड़े तो बाकी बचे रेणुका बिश्नोई, विधायक कुलदीप बिश्नोई , रणदीप सुरजेवाला और किरण चौधरी का नाम सुर्खियों में है। हो सकता है की तंवर इन्ही में से किसी एक नाम को पार्टी हाईकमान के समक्ष रखे। क्योंकि यह नेता हुड्डा गुट के नहीं माने जाते इसलिए हो सकता है कि इन्ही नामो पर बात बने।

गुटबाजी के कारण प्रतिपक्ष नेता का फैसला मुश्किल

भूपेंद्र सिंह हुड्डा जानते है कि भले ही उन्होंने नेता प्रतिपक्ष को लेकर कोई भी फैसला लिया वो तब तक पूरा नहीं हो पायेगा जब तक उसे अशोक तंवर और पार्टी हाईकमान की मंजूरी न मिले। जैसा की आपको पता है कि अशोक तंवर भले ही गुटबाजी की बातो से इंकार करते हो मगर यह तो हकीकत है कि अशोक तंवर की बैठक से हुड्डा और हुड्डा समर्थको ने जिस प्रकार अपनी दुरी बनाकर राखी उसने इस बात को साबित कर दिया कि तंवर और हुड्डा गुट एक दूसरे को एक नहीं सुहाते। यही कारण है कि अशोक तंवर यह पूरी कोशिश करेंगे कि पार्टी हाईकमान के आदेशों और उनकी अनुमति के बिना नेता प्रतिपक्ष के नाम का चयन न हो।
हो सकता है की अशोक तंवर उन नामो की सिफारिश करे जो हुड्डा समर्थको में शामिल नहीं है।

क्या गुटबाजी और घमासान की बीच केंद्र नहीं लेगा फैसला

जानकार मानते है कि अगर पार्टी के अंदर ऐसे ही घमासान चलता रहा तो हो सकता है कि वह किसी के नाम पर फैसला न ले। क्योंकि जानकार मानते है कि विधानसभा में अशोक तंवर और हुड्डा समर्थक आपसे में न भिड़े इसलिए वह इसको लेकर कोई फैसला नहीं लेंगे।

Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close