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कांग्रेस को ले डूबे हुड्डा!

अशोक तंवर- कुलदीप बिश्नोई की जुगलबंदी कर सकती है कमाल, बचा सकती है कांग्रेस | हुड्डा के बगावती तेवर कांग्रेस हाईकमान पर दबाव या ब्लैकमेलिंग

भूपेंद्र हुड्डा के गुलाबी गैंग का हरियाणा कांग्रेस में दबाव को तोड़ने में राहुल भी नाकाम , भूपेंद्र हुड्डा को किसी भी हाल में प्रदेशाध्यक्ष बनाने के मूड में नहीं राहुल

अर्चना त्रिपाठी | हिसार टुडे
हरियाणा कांग्रेस में प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर हो घमासान किसी बड़े युद्ध से कम नहीं। जिस प्रकार से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 9 जून को अपने खास समर्थकों की दिल्ली में बैठक बुलाई है। उससे यह तो तय है कि भूपेंद्र हुड्डा कांग्रेस में अपने गुलाबी गैंग के साथ बगावती तेवर के मूड में है। इसी बीच अशोक तंवर के समर्थकों ने व्हाट्सप्प में एक सन्देश चलकर हुड्डा के बैठक के पहले आग में घी डालने का काम करते हुए कहा कि “अमेरिका के राष्ट्रपति से भी बड़ा है हरियाणा में कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव।”

दरअसल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की मिटटी पलीद होने के बाद हुड्डा समर्थकों को कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर पर निशाना साधने का मौका मिल गया कि उनके कारण कांग्रेस दुर्दशा हो गयी है। इस बैठक को बेहद खास माना जा रहा है। क्योंकि बैठक महज बैठक नहीं बल्कि यह पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बगावती तेवर को भी उजागर कर रहा है। माना जा रहा है कि हरियाणा प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद के साथ हुयी बैठक में जब अशोक तंवर को हटाने की कांग्रेस हुड्डा गुट की चाल कामयाब नहीं हो पायी तो हाईकमान पर दबाव बनाने के लिए हुड्डा ने 9 तारीख को बैठक लेने की घोषणा कर डाली। जाहिर सी बात है कि हुड्डा ऐसा करके अपने समर्थित विधायकों और इच्छुक विधायकों का ताकत दिखाकर कांग्रेस हाईकमान पर दबाव बनाने की कोशिश में है। साथ ही वह इस बात के भी संकेत दे रहे हैं कि अगर पार्टी ने उनको नजरअंदाज किया तो वह पार्टी से बगावत भी करके नई पार्टी बनाने का दम रखते हैं। मगर हुड्डा चाहे जो भी करे मगर राहुल गांधी इतना तो समझ गए हैं कि आज हरियाणा में हुड्डा के कारण ही कांग्रेस गुटों में बंटी हुई है और यह गुलाबी गैंग किसी और को वहां टिकने ही नहीं देता।

हालांकि हुड्डा की तुलना में दीपेंद्र हुड्डा की राहुल गांधी के समक्ष अच्छी छवि है। इसलिए राहुल कठोर फैसला लेने से पहले गुलाम नबी आजाद को ही इस हालत से निपटने की जिम्मेदारी दे दी थी। मगर जिस प्रकार से यह गुटबाजी निकलकर सामने आ रही है उससे यह तो तय है कि अब गुलाम नबी आजाद ने भी अपने हथियार डाल दिए है।

बता दें कि इस बीच जहां भूपेंद्र हुड्डा अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, मगर इस बैठक से कुलदीप बिश्नोई, रेणुका बिश्नोई, रणदीप सुरजेवाला, किरण चौधरी और कुमारी सैलजा अपनी दूरी बनाकर रखने वाली हैं। ऐसा माना जा रहा है कि प्रदेशाध्यक्ष की इस दौड़ में हुड्डा इतने बेचैन हो गए हैं कि पार्टी फुट की राह में आ चुकी है। इसीलिए कभी हुड्डा और ओमप्रकाश चौटाला की नजदीकियों की खबरें सियासी पारे को और गरमा रही है। तो वहीं हुड्डा खेमे के विधायकों का आक्रामक रूप भी पार्टी के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर रहा है।

हालांकि इसमें राहुल गांधी के करीबी रहे कुलदीप बिश्नोई, रणदीप सुरजेवाला, रेणुका बिश्नोई, कुमारी शैलजा, किरण चौधरी और अशोक तंवर की बात करें तो जिस प्रकार से कुलदीप बिश्नोई और अशोक तंवर के करीबी रिश्ते की खबरें आ रही हैं, तो जानकार मानते हैं कि इन दोनों नेताओं की जुगलबंदी कांग्रेस को इस गुलाबी गैंग से जरूर मुक्ति दे सकती है।

बगावती हुड्डा प्रदेशाध्यक्ष पद के लालच में 9 को लेंगे बैठक

लोकसभा चुनाव में हार के कारणों की समीक्षा के लिए बुलाई गई दो बैठकों में अशोक तंवर को प्रदेशाध्यक्ष के पद से हटाने के लिए कांग्रेस दिग्गज आमने-सामने हो चुके हैं। कांग्रेसियों की गुटबाजी के चलते प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद तक को बैठक बीच में ही छोड़कर जाना पड़ा था। हुड्डा समर्थक विधायक जहां प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाने के लिए हाईकमान पर दबाव बना रहे, वहीं तंवर खुद इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं। इस बीच हुड्डा समर्थक समूह ने अब कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी को भी निशाने पर लेना शुरू कर दिया है। कांग्रेसियों की लड़ाई इस हद तक पहुंच गई कि अब पार्टी नेता एक दूसरे पर गाली-गलौज करने तथा गोली मार देने की बात कह कर कांग्रेस की बची-कूची इज्जत उतारने में लगे हैं। हुड्डा को जब इस बात का आभास हुआ कि पार्टी हाईकमान विधानसभा चुनाव तक अशोक तंवर को नहीं हटाने वाले हैं तो ऐसे में अपना राजनीतिक भविष्य देखते हुए हुड्डा ने 9 तारीख को बैठक लेने की घोषणा कर दी। इस बैठक में हुड्डा समर्थक विधायक को बुलाये जाने के साथ ही उन पूर्व विधायकों और कार्यकर्ताओं को बुलाये जाने के संकेत मिल रहे हैं जो हुड्डा के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने चाहते हैं। इससे हुड्डा एक तीर से कई निशाना लगाना चाहते हैं। पहला पार्टी हाईकमान पर उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाने का दबाव, किसी और गुट को पनपने नहीं देना, मुख्यमंत्री का चेहरा बनाना और खुद को कांग्रेस का बड़ा नेता साबित करना।

हुड्डा बनाएंगे अलग पार्टी या करेंगे ब्लैकमेलिंग

भूपेंद्र हुड्डा को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के पक्ष में राहुल गांधी नहीं हैं। क्योंकि राहुल का मानना है कि हुड्डा ही हैं जिनके कारण प्रियंका गांधी का राजनीति में कदम रखना मुश्किल हो गया है क्यूंकि जानकार मानते हैं कि रोबर्ट वाड्रा का नाम भूमि अधिग्रहण में आने का कारण सिर्फ हुड्डा ही है। जिसका खामियाजा आज तक राहुल गांधी के परिवार और प्रियंका गांधी को उठाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं जब इस लोकसभा चुनाव में प्रियंका पार्टी प्रचार के लिए आयी तब दूसरी तरफ सीबीआई ने रोबर्ट वाड्रा पर अपनी कार्यवाई को और तेज कर दिया था। यही कारण है कि राहुल हुड्डा को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि जब हुड्डा को लगा कि सीधे उंगली से घी नहीं निकल रही तो उन्होंने उंगली टेडी कर 9 की बैठक का आयोजन कर कहीं न कहीं पार्टी हाईकमान राहुल गांधी को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि ऐसा करके हुड्डा अलग पार्टी बनाने पर भी चर्चा कर सकते हैं।

अशोक तंवर और कुलदीप बिश्नोई की जुगलबंदी पर राहुल को भरोसा

बता दंे कि राहुल गांधी यह मानते हैं कि आज हरियाणा में कांग्रेस का जो हाल है उसका कारण तंवर नहीं बल्कि हुड्डा गुट है। आज कांग्रेस के अंदर अशोक तंवर की जो हालत है इसका आभास राहुल गांधी ही नहीं गुलाम नबी आजाद को पहले से ही था। इसलिए राहुल हरियाणा में ऐसी टीम लाना चाहते हैं जो हुड्डा के गुट को तोड़ सके। इसलिए अशोक तंवर पर उन्होंने भरोसा किया। इतना ही नहीं राहुल गांधी कुलदीप बिश्नोई पर भी आस लगाए बैठे हैं। बता दें कि कुलदीप बिश्नोई के बेटे भव्य बिश्नोई के नामांकन में स्वयं उपस्थित होकर यह दिखने की कोशिश की कि कुलदीप बिश्नोई और अशोक तंवर के रिश्ते मजबूत हैं। ऐसे में पार्टी हाईकमान को यह भी लग रहा है कि अगर हरियाणा में अशोक तंवर और कुलदीप बिश्नोई की जुगलबंदी चली तो हो सकता है कि इस गुट से कांग्रेस को राहत मिले।

अपनी पार्टी बनाकर महागठबंधन का भी हुड्डा बना सकते हैं विचार

बता दें कि पैरोल से बाहर आते ही औमप्रकाश चौटाला जिनकी हुड्डा से शुरू से ही राजनीतिक दुश्मनी थी। उन्होंने भूपेंद्र हुड्डा के बेटे दीपेंद्र की तारीफ कर दी और बदले में हुड्डा ने कहा कि मेरे राजनीतिक मतभेद भले ही हों, मगर उनके बेटे हमारे बेटे हैं और हमारे बेटे उनके बेटे हैं। यह यह वक्तव्य हुड्डा के मुँह से उस समय बाहर आने के बहुत मायने लगाए जा रहे है जब हुड्डा खुद का राजनीतिक भविष्य बचाने और हरियाणा की राजनीति में अपना दबदबा बताने के प्रयास में लगे हंै। उनके इस वकतव्य को जानकर आगामी विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को लेकर उनके दिमाग में चल रहे विचारों से लेकर देख रहे हैं। क्योंकि इन दोनों ही पार्टी का मूल वोट बैंक जाट समुदाय ही रहा हैंै। ऐसे में जाती का विभाजित मत एक साथ लाने के पहले में वह आगामी समय में अपनी पार्टी बनाकर या महागठबंधन का दांव भी खेल सकते हैं और अगर ऐसा होता है तो हरियाणा की राजनीति में यह किसी नए अध्याय से कम नहीं होगा।

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