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गौतम सरदाना के मेयर दावेदारी पर पंजाबी समाज के नेताओं ने उठाए सवाल

Hisar Today

अर्चना त्रिपाठी | हिसार
भीम महाजन की भाजपा में एंट्री के बाद से गौतम सरदाना ने मेयर पद के लिए निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर खुद को मेयर प्रत्याशी बताकर पंजाबी प्रत्याशी के तौर पर चुनावी प्रचार शुरु कर दिया है। सूत्रों का मानना है कि भाजपा के कुछ नेता गौतम सरदाना को भाजपा में शामिल करवाने की जद्दोजहद में थे और गौतम सरदाना बदले में मेयर पद की दावेदारी मांग रहे थे, मगर भाजपा के पार्टी आलाकमान ने गौतम को ऐसा कोई भी आश्वासन देने से मना कर दिया। पार्टी के शीर्ष नेता गौतम को मेयर पद की दावेदारी देने को तैयार नहीं थे। गौतम सरदाना इसी इंतजार में थे कि शायद उन्हें भाजपा में शामिल करे, मगर भाजपा ने भीम महाजन को जिस बल के साथ पार्टी में शामिल करवाया उससे गौतम सरदाना के सारे मंसूबो पर पानी फिर गया। उसके बाद से गौतम जगह-जगह सभा करके खुद अपने दम पर निर्दलीय रूप से मेयर पद का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

भीम महाजन खुद एक पंजाबी प्रत्याशी हैं ऐसे में गौतम सरदाना भी खुद को पंजाबी उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। युवा समाज सेवी मनोज सिंधवानी का मानना है कि गौतम सरदाना ऐसे व्यक्ति हैं जो सोचते है, जितना बड़ा नेता मैं बन गया हूं उतना बड़ा नेता कोई पैदा न हो, पैदा होने के पहले जड़ों को काट दिया जाए। मनोज सिंधवानी का कहना था कि जब उन्हें वोट चाहिए होता है तो पंजाबी कम्यूनिटी का नाम लेते हैं और जब हम और भीम महाजन जैसे पंजाबी उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं तो उनके खिलाफ वह खुद का उम्मीदवार खड़ा कर देते थे ताकि सामने वाला जीत न पाए और उनकी बराबरी कोई कर न पाए। वैसे दशकों से हिसार की राजनीति में पंजाबी समाज का चेहरा बनकर उभरे गौतम सरदाना अब विधायक, पार्षद चुनाव के बाद अब मेयर चुनाव की तैयारियों में जमीन आसमान एक कर रहे हैं।

मगर जिस पंजाबी समाज के चहरे के तौर पर वो खुद को चुनावी मैदान में उतारने के लिए उतावले है, आज उन्हें उसी समाज के प्रत्याशियों से कड़ी नाराजगी और आलोचना का समाना करना पड़ रहा है। आज लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि सत्ता और पद के लालच में गौतम सरदाना कभी विधायक चुनाव, कभी पार्षद चुनाव हार चुके हैं, अब दोबारा उन्हें चुनाव लड़ने की क्या जरुरत है। पंजाबी समाज के लोग यह सवाल उठा रहे है कि गौतम सरदाना को आज दूसरे युवा पंजाबी समाज के अन्य लोगो को सहयोग देना चाहिए न कि खुद चुनाव में खड़ा होकर

अपनी राजनितिक रोटियां सेकनी चाहिए।

गौरतलब है कि 7 मार्च 1974 में जन्मे गौतम सरदाना ने राजनीति में कदम अपने शुरुवाती दौर में कॉलेज से जनरल सैक्रेटरी का इलेक्टशन लड़कर की थी। ततपश्चात राजनीतिक महत्वकांशा के तहत उन्होंने नगर पार्षद का चुनाव लड़ा जिसमें उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा, उन्होंने 2009 में विधायक पद का चुनाव भी लड़ा जहां उन्हें मुंह की खानी पड़ी, फिर 2014 में उन्होंने पद की लालसा नहीं छोड़ी और हजकां की टिकट पर चुनाव लड़ा जहा फिर हार का स्वाद चखना पड़ा। मगर लगातार तीन-तीन हार के बावजूद गौरतम सरदाना ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ी और दौबारा मेयर चुनाव के लिए लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

गौतम के मामले में जानकारों का मानना है कि उनका राजगुरु मार्किट में प्रभाव है, मगर जातिगत राजनीति छोड़कर उन्हें किसी अन्य उम्मीदवार को सहयोग कर राजनीति से ही संन्यास ले लेना चाहिए। खुद पंजाबी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले अनिल तनेजा ने गौतम सरदाना को आड़े हाथो लेते हुए कहा कि “वो पंजाबियों के ठेकेदार है क्या, क्या किसी और पंजाबी को नहीं आना चाहिए आगे। एक उम्मीदवार तीन

बार चुनाव हार चुका है तो उसे को दौबारा मौका क्यों दे?

गौतम सरदाना तो ऐसे नेता है जो 10 मिनट के लिए राजनीति चमकाने के लिए बैनर लगाते है, भाषणबाजी करके 10 मिनट में निकल जाते हैं। आज गौतम सरदाना की राजनीति पर ही सवाल उठने लगे है। लोग उन्हें “वोट कटुवा” उम्मीदवार के तौर पर अलंकरित कर रहे हैं। पंजाबी समाज के युवा प्रत्याशियों का मानना है कि गौतम का अब राजनीति में कोई काम नहीं है, उन्हें तो उल्टा युवा उम्मीदवारों को सहयोग करना चाहिए।

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