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सुप्रीम कोर्ट का कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई से इनकार, कहा-इलेक्शन कमीशन जाएं

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में खाली दो राज्यसभा सीटों के लिए अलग-अलग उपचुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ गुजरात कांग्रेस की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है।

हिसार टुडे | नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में खाली दो राज्यसभा सीटों के लिए अलग-अलग उपचुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ गुजरात कांग्रेस की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका गुजरात कांग्रेस के नेता परेशभाई धनानी ने दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा है कि वह चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

पिछली सुनवाई में न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अवकाश पीठ में दाखिल याचिका में कांग्रेस ने कहा था कि यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे चुनावी याचिका के माध्यम से उठाया जा सके, इसलिए इस पर सुनवाई आवश्यक है। गुजरात कांग्रेस की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के कुछ फैसले हैं जो उनके पक्ष में हैं। इस पर पीठ ने कहा, हम अभी कुछ नहीं कह रहे हैं। हमें यह तय करना होगा कि यह सामान्य रिक्ति है या फिर संवैधानिक। इस मामले पर सुनवाई जरूरी है।

गौरतलब है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी की वरिष्ठ नेता स्मृति ईरानी के क्रमश: गांधीनगर और अमेठी से लोकसभा पहुंचने के बाद गुजरात से राज्यसभा की दो सीटें खाली हो गई हैं। निर्वाचन आयोग की ओर से 15 जून को जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दोनों सीटों के लिए चुनाव पांच जुलाई को ही होने हैं। कांग्रेस ने याचिका में कहा है कि एक ही दिन दोनों सीटों पर अलग-अलग चुनाव कराना असंवैधानिक और संविधान की भावना के खिलाफ है।

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अलग-अलग चुनाव पर कांग्रेस को क्या  नुकसान?

गुजरात में विधानसभा की कुल 182 सीटें हैं, लेकिन फिलहाल इसके 175 सदस्य हैं। बीजेपी के पास 100 सीटें हैं जबकि कांग्रेस के पास 71 सीटें हैं। राज्यसभा की सीटों के लिए संबंधित राज्य के विधायक ही वोट देते हैं। इन विधायकों में से हर कोई दोनों सीटों के लिए 2 अलग-अलग बैलट से वोट देंगे। ऐसे में किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए 88 वोटों की दरकार होगी। कांग्रेस के सिर्फ 71 विधायक हैं, लिहाजा उसका दोनों में से किसी पर भी जीत मुश्किल है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि राज्यसभा सहित दोनों सदनों की सभी रिक्तियों पर उपचुनाव के लिए उन्हें ‘अलग-अलग रिक्तियां’ माना जाएगा और अलग-अलग अधिसूचना जारी की जाएगी। चुनाव भी अलग-अलग होंगे। हालांकि इनका कार्यक्रम समान हो सकता है। चुनाव आयोग ने दिल्ली हाई कोर्ट के 1994 और 2009 के 2 फैसलों का भी जिक्र किया है, जो उसके फैसले का समर्थन करते हैं।

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