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पितरों के साथ-साथ जीवित माता-पिता की भी करें मान-सम्मान

लेखक आशीष लावट

हिसार टुडे

पितृपक्ष शुरू हो चुके हैं और सभी लोग अपने पूर्वजों की याद में श्राद्ध व तर्पण और ब्राह्मणों को भोजन दक्षिणा आदि भी श्रद्धानुसार करेंगे ही कहते हैं कि पृथ्वी लोक पर पितृपक्ष में किया गया दान भोजन सामग्री और जल व तर्पण पितृलोक में हमारे पूर्वजों तक पहुंच जाता है।हमेशा की तरह यह भी बताया जाता है कि श्राद्ध करने के कौन कौन अधिकारी हैं और कैसे तर्पण करें मान्यता तो यह है कि बेटा भतीजा या अन्य कोई पुरुष रिश्ते दार इस कर्मकांड को करे और पुरुष सदस्यों के न होने पर कौन कौन कर सकते हैं
जो बच्चे अपने मां बाप के जीवित रहते दो वक़्त की रोटी नहीं दी ना कभी सम्मान किया अपने बूढ़े और कमजोर हो चुके बीमार पिता की देखभाल नहीं करी तो फिर श्राद्ध कर्म भी क्यो करें लेकिन ये मेरी सोच है अगर उन्हें लगता है कि उनके द्वारा किए गए श्राद्ध का कोई औचित्य है तो वो करें

पिता के न रहने पर वही पुत्र अब मां को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते और मां के नरहने पर पिता को अपमानित करना और देखभाल करना तो दूर की बात है एक ही घर में रहते हुए मां ठीक या नहीं उसकी चिंता नहीं है तो कल मरने के बाद श्राद्ध भी करेंगे ब्राह्मण जिमाऐंगे जैसे अपने पिता के श्राद्ध पर करते हैं

आज इस उम्र में जीवन के अनुभव से सीख लेकर मेरी सोच है कि अपने माता पिता और बुजुर्गों की जितनी सेवा करना देखभाल मान सम्मान देना हो उनके जीवित रहते हुए ही करें जिससे दुनिया छोड़ने से पहले वो संतुष्ट हो कर जाएँ
अखबार में पढ़ा कि श्राद्ध किसलिए क्यो और कौन-कौन करें तो मैं यह सारणी दे रहा हूं आप भी पढ़ें।
मैंने अपने जीवन के अनुभव से सीख लेकर ये पोस्ट लिखी है लेकिन शायद आप सब इस बात से सहमत ना हों। श्रद्धा और आस्था में किसी तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती है लेकिन समय के साथ मेरी सोच बदल चुकी है।

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