जीवन मंत्राटुडे न्यूज़

‘‘राधे झूलन पधारो’’

अचरज बंगला एक बनाया, बांस न बल्ला-बंधन घने।

हिसार टुडे । सुदर्शन गुप्ता

आजकल मैं शरीर से कम और मन से अधिक थका-थका सा प्रतीत करता हूं। मैंने 90 प्रतिशत जिंदगी दूसरों के फैसलों पर गुजार दी पर आज मैं अपने फैसले खुद लेकर जीना सीख गया हूं। मेरे निश्चय सदैव चट्टान से कम नहीं रहे। मैंने पैसा तो अधिक नहीं कमाया, पर आत्म सम्मान और विश्वास कभी न खोया। घाट-घाट का व अनेक प्रान्तों का सारे भारतवर्ष का पानी पी चुका हूं।
आधे होश और आधे जोश की जिंदगी भी जी चुका हूं। बेहोशी में भी होश नहीं खोया, भूख से कभी परेशान नहीं हुआ, मस्ती का आलम यह है कि मैं शोर शराबे में भी भजन और गीत गुनगुना लेता हूं और अपने छोटे-छोटे लेख या विचारों को गूंथकर, दिन-रात के अन्तर को कम कर लेता हूं।

शरीफ आदमियों की तरह जिंदगी गुजार लेता हूं, अपने शोक पैदल चलकर या पुरानी गज़ल या भजन सुनकर पूरे कर ही लेता हूं। क्रोध को अक्सर कूड़े के डिब्बे में डालता रहता हूं। बादल की तरह गरजकर और बिजली की तरह चमक कर अपने विचारों को सुधारता रहता हूं। दुनियां में गरीबों को आराम नहीं मिलता और मुझे तो हंसने का पैगाम भी मिलता रहता है। गाड़ी वालों को देखता हूं या किसी नवयौवना का दुपट्टा सड़क पर रेंगता जा रहा है। पर किसे होश है, जिंदगी अपनी गति से बेहोश चल रही है। गाड़ी होले-होले मेरी दुकान के आगे से कीड़ियों या कहों चींटियों की तरह रेंगती हुई निकल जाती है। सावन का महीना आ गया है। मेघ मलहार का नजारा होगा, बूंदा बांदी या छिंटा-छांटी से मन हरा-भरा होगा। दिल की हालत क्या कहिये, कुछ आबाद भी होगा, कुछ बर्बाद भी होगा, कुछ शाद भी होगा, तो कुछ नाशाद भी होगा। प्रकृति फिर सावन के आने से अपने यौवन पर लौंट आएगी, परींदे भी बाग-बगीचे को खुशहाल करते नजर आएंगे। मोर अपने हुनर को दिखाएगा, मोरनी को रिझाएगा। एक सौंधी सी खुशबू सावन के आने से वातावरण की मिट्टी में जरूरी आएगी। नव यौवन में रक्त संचार फिर एक बार और अच्छा होगा। मां-बहनों तथा लड़कियों की दुआओं का असर भी सावन में कलाइयों पर जोरदार होता है। प्रणयकाल का महीना सावन ही तो होता है, लड़कियां तथा सांस अपने अपने स्थान परिवर्तन करके, देश की जाति की परम्पराओं को आगे बढ़ा ही देती है।

बारिश के दिनों में प्रकृति अपनी हरी चुनर ओढ़कर कितनी अच्छी लगती है? प्रकृति सावन के महीने में अपनी सुन्दरतम सुन्दरता के चरम सीमा पर होती है। सामान्यता नर अपनी मादा की तुलना में अधिक भड़कीले-चमकीले कपड़े पहनकर अधिक खुशी अनुभव करते है। सावन की बौछारों में नर-नारी अधिक रंगीन तथा आकर्शक नजर आते हैं।

खरमोर प्रणय प्रदर्शन के दौरान मादा को लुभाने तथा आकर्शित करने के लिए पांच सौ बार तक चार-पांच फुट की ऊंचाई तक छलांक लगाकर नाचता है। ये पंछी मध्य प्रदेश के उपवन, धार, रतलाम ओर सैलाना के घार के मैदानों में सावन में ही दिखाई देता है या कहो पाया जाता है। बरसात या कहो सावन के महीने में बया पंछी अपना जोड़ा और घांेसला या घर बनाने में व्यस्त तथा मस्त रहती है। इसके घर हवा में झूलते, बबूल या खजूर के पेड़ों पर अक्सर देखे जा सकते हैं। बया एक घरेलु सी चिड़िया होती है जो भारत के अनेक राज्यों में पाई जाती है तथा देखी जा सकती है। इसके नर-मादा भी लगभग एक जैसे सुहावने दिखाई देते है। प्रणयकाल में पंछी और भी लाल, पीले आकर्शक हो जाते हैं। प्रजनन काल या सावन के महीने में नर-नारियों का सौंदर्य भी बढ़ जाता है। घौंसलों की विचित्र बनावट, सजावट देखकर ही तो छः सौ वर्श पूर्व गंगा-यमुना की तहजीब को एक करने वाले लेखक सूफी संत श्री अमीर खुसरो जी के सुनहरे पन्नों से निकले शब्दों ने उनकी कलम को अमर कर दिया।

‘‘अचरज बंगला एक बनाया,
बांस न बल्ला-बंधन घने।
ऊपर नींव-तरे घर छाया, कहे खुसरो-घर कैसे बनाया?’’

कवि और लेखक की कल्पना का भी सावन या रिमझिम में ऊंची उड़ान अपने आप ही मिल जाती है। सावन के आगमन में मेरे हृदय में जो शब्द या विचार आए ये तो प्रकृति की ही देन है।

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