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कांग्रेस नेताओं ने जयप्रकाश के बेटे के नाम की सिफारिश कर साधे “एक तीर से तीन निशाने”

महेश मेहता | हिसार

सियासत इसी बात पर चमकती है जब आपसी गुटबाजी के बीच अपना नेता सत्ता की गद्दी पर बैठे और दुश्मन हार जाए। वैसे अगर बात हरियाणा में कांग्रेस पार्टी की करें तो दूर दूर तक नजर दौड़ाने के बावजूद यही दिखाई देता है कि आज कांग्रेस के नेता ही कांग्रेस के दुश्मन बन चुके हैं।
यहां कांग्रेस पार्टी से जिताने से ज्यादा कांग्रेस नेता पार्टी के प्रत्याशी को हराने ही होड़ में ज्यादा दिखाई देते हैं। असमंजस की स्तिथी इसी बात को लेकर और बढ़ जाती है जब हरियाणा मे कांग्रेस की सियासत इतनी विकट दौर पर चल रही है कि खुद कांग्रेस पार्टी आलाकमान राहुल गांधी भी अन्य राज्यों के प्रदेशाध्यक्ष का चयन करते हैं। मगर जब बात आती है हरियाणा की तब वह किसी प्रकार का निर्णय लेने से बचते नाजर आते हैं। राहुल का हरियाणा को लेकर यह डर स्वाभाविक भी है। क्योंकि अगर उन्होंने कोई निर्णय लिया तो पार्टी के अंदर घमासान छिड़ जाएगा।
जयप्रकाश बांगर के सियासत के दुश्मनों का षड्यंत्र।

बता दें कि हरियाणा की राजनीति में पूर्व केंद्रीय मंत्री व वर्तमान में कलायत से निर्दलीय विधायक जयप्रकाश बांगर की सियासत में खास चेहरा माने जाते हैं। पिछले उपचुनाव में कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने पर कलायत से निर्दलीय विधायक बनने वाले जयप्रकाश को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा का करीबी माना जाता है। कलायत विधानसभा सीट पर कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला की सहमति होने के कारण जयप्रकाश ने कुछ महीने पहले उनसे हाथ मिला लिया था। राजकीय पंडितो का मानना है कि जींद उपचुनाव में पूर्व विधायक जयप्रकाश की भूमिका निर्णायक और बेहद अहम मानी जाती है।

जींद शहर में ही जयप्रकाश का आवास होने के कारण उनके प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। मगर सूत्रों के हवाले से इस बात की चर्चा जोरों पर है कि कांग्रेस के एक बड़े नेता जयप्रकाश को अपने रास्ते से हटाने के लिए जींद उपचुनाव को एक चक्रव्यूह के रूप में इस्तेमाल कर जयप्रकाश की ख्याति और उनकी राजनीति विरासत को खत्म करना चाहते है। बता दें कि हिसार, जींद, कैथल और कुरुक्षेत्र जिलों में फैला हुआ बांगर का इलाका प्रदेश की सत्ता में नेहड़ अहम स्थान रखता है। प्रदेश कांग्रेस में दो दशक तक तक बीरेंद्र सिंह और शमशेर सिंह सुरजेवाला में बांगर का चौधरी बनने की रस्साकशी चलती रही । 2000 के बाद शमशेर सुरजेवाला की राजनीतिक विरासत की बागडोर उनके बेटे रणदीप सुरजेवाला ने संभाल ली। रणदीप सुरजेवाला और बीरेंद्र सिंह के साथ भी 36 का आंकड़ा बरकरार रहा।

बीरेंद्र सिंह के कांग्रेस छोड़ने के बाद ही दोनों परिवारों में वर्षों की जंग पर विराम लगा। इस बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश भी बांगर की चौधर के तीसरे दावेदार बनकर कांग्रेस में शामिल हो गए। रणदीप सुरजेवाला के साथ उनकी खींचातानी जगजाहिर है। पिछले चुनाव में रणदीप सुरजेवाला ने जयप्रकाश को कलायत से कांग्रेस की टिकट नहीं लेने दी। जिसके चलते जयप्रकाश ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल करके सबको चुप करा दिया। इसी बीच जींद उपचुनाव में जयप्रकाश की मजबूत दावेदारी भी कुछ लोगों को खटकने लगी है। कांग्रेस के नेता यह नहीं चाहते कि जयप्रकाश का राजनीतिक कॅरिअर आगे बढे। इसलिए जींद उपचुनाव को लेकर दिल्ली दरबार में हुई कांग्रेस के नेताओं की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा और रणदीप सुरजेवाला ने जींद उपचुनाव के लिए जयप्रकाश के बेटे विकास को सबसे बेहतर प्रत्याशी बता कर उसके नाम का प्रस्तावित किया है। अगली बैठक में उपचुनाव प्रभारी के सामने यह दिखाया जाएगा कि सिर्फ जयप्रकाश का बेटा विकास जींद उपचुनाव को जीत सकता है।

जयप्रकाश के बेटे के सामने हो सकती है कड़ी चुनौती

ऐसी उम्मीद कम की जा रही है कि जयप्रकाश के बेटे विकास अन्य पार्टियों के दिगज्जों के सामने प्रबल तरीके से चुनाव जीत पाएंगे ? क्योंकि जींद उपचुनाव में स्थिती ऐसी है कि जहां दुबारा बनिया, जाट और सैनी फैक्टर असर डालेंगे। इतिहास गवाह है कि हिसार में लोकसभा चुनाव के दौरान जब जाट वोटर तत्कालीन इनेलो के नेता संपत सिंह के साथ चले गए थे और गैर जाट वोट कुलदीप बिश्नोई के साथ खड़े हो गए थे। इस वजह से जयप्रकाश की जमानत जब्त हो गई थी। वही इतिहास जींद उपचुनाव में भी दिखाई दे सकता है। क्योंकि इस बार भाजपा नॉनजाट के फॉर्मूला पर खेलने का मन बना रही है। जिसके चलते जींद शहर में भाजपा का पलड़ा भारी दिख रहा है।

जबकि जींद जिले में जाट वोटरों का रुझान ज्यादातर इनेलो से खिसक कर दुष्यंत चौटाला की जजपा पार्टी की तरफ जा रहा है। ऐसे में दुबारा दो भागों में वोटरों के विभाजन के बीच फंसकर जयप्रकाश का बेटा विकास सियासत के पहले ही पायदान पर करारी हार का शिकार बेहद आसानी से बन सकता है। बता दे कि जींद उपचुनाव में कुछ नेता जयप्रकाश के बेटे विकास का नाम लेकर जयप्रकाश के बेटे को आगे कर उसका सियासी कॅरिअर जीत के साथ आगाज करने की बजाय हार की मुहर के साथ शुरू करने की कोशिश में लगे हैं।

जयप्रकाश के बेटे विकास का नाम साजिशों का हिस्सा
जयप्रकाश को यह लगता है कि जींद उपचुनाव जीतकर उनका बेटा बड़ी सियासी लॉन्चिंग धमाके के साथ कर सकेगा। जयप्रकाश इन नेताओं के प्रभाव में आकर अपने बेटे को उपचुनाव में उतारने का फैसला ले सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर जयप्रकाश अपनी मजबूत पकड़ के बलबूते बेटे विकास को उपचुनाव में जीत दिलवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाकर जीत हासिल करवाते हंै तो जेपी की अपने बेटे के लिए मनचाही लॉन्चिंग साबित होगी। वहीं ठीक दूसरी तरफ अगर जयप्रकाश का बेटा विकास उपचुनाव हार गया तो जयप्रकाश की छवि और सियासत में उसकी मजबूती पर बुरा असर पड़ेगा।

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