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पार्टी और पुत्र के बीच फंसी सोनिया ने हरियाणा में कर दी देर…

और पिछड़ गए हुड्डा

हरियाणा में त्रिशंकु मिलता दिख रहा जनादेश
कांग्रेस की दोगुनी हो सकती हैं विधानसाभा सीट

टुडे न्यूज | हिसार टुडे

हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे आ रहे हैं और प्रदेश में किसी भी पार्टी को बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा है। हरियाणा में अभी तक आए रुझान के मुताबित बीजेपी की सीटें घटती नजर आ रही हैं तो कांग्रेस की सीटों में इजाफा होता दिख रहा है। जबकि सत्ता की चाबी जेजेपी और अन्य के हाथों में जाती दिख रही है।

बता दें कि लोकसभा चुनाव की हार से निराश कांग्रेस के लिए भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा में एक बार फिर संजीवनी बनते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हरियाणा में चेहरा बनाने और कुमारी शैलजा को प्रदेशाध्यक्ष बनाने का फैसला विधानसभा चुनाव ऐलान से महज 15 दिन पहले लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि सोनिया गांधी पार्टी और पुत्र राहुल गांधी के मोह में फंसी रही, जिसके चलते भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर भरोसा जताने में काफी देर कर दी। इसी का नतीजा है कि कांग्रेस तीस सीटों पर बढ़त बनाने के बाद भी बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर नजर आ रही है।

हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों पर आ रहे रुझान के मुताबिक बीजेपी को 40, कांग्रेस को 30, जेजेपी को 12 और अन्य को 8 सीटें मिलती दिख रही हैं। हालांकि, 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 47, कांग्रेस 15, इनेलो को 19 और अन्य को 9 सीटें मिली थीं।
दिलचस्प बात ये है कि 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद से भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक तंवर को हटाने की मांग करते रहे, लेकिन राहुल गांधी के करीबी होने के चलते कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व इसे नजर अंदाज करता रहा।
हालत ये हो गई कि हुड्डा ने रोहतक में रैली करके तंवर को हटाने के लिए कांग्रेस आलाकामन को अल्टीमेटम तक दे दिया। इसके बाद कहीं जाकर प्रदेशाध्यक्ष पद से अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा को पार्टी की कमान सौंपी गई और भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सीएलपी लीडर और हरियाणा में कांग्रेस का चेहरा बनाया गया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा के चेहरे के सहारे चुनावी मैदान में उतरने का फैसला 4 सिंतबर को लिया।

हरियाणा में हुड्डा को कांग्रेस प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनाव में हर फैसले के लिए पूरी छूट दी गई। हुड्डा ने रण में उतरकर पूरा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा और खुद को खट्टर के विकल्प के तौर पर खड़ा किया।

इसी के चलते जाट समुदाय का बड़ा तबका हुड्डा के नाम पर कांग्रेस के साथ एकजुट होता दिखाई दिया। इसका असर कांग्रेस 15 सीटों से बढ़कर 30 के आंकड़े को छूती दिख रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस आलाकमान ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कमान और पहले सौंपी होती तो हरियाणा के नतीजे कुछ और ही होते?

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