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अब गुलाम नबी आजाद को तंवर ने किसके इशारा में दिखाया ठेंगा

कमेटी का नाम बदल कर किया चुनाव योजना एवं प्रबंधन ग्रुप

  •  गुलाम नबी आजाद के द्वारा समिति बर्खास्त के बावजूद तंवर ने ली बैठक, क्या राहुल गाँधी से मिल रहा निर्देश ?
  •  दुबई के व्यापारी सुदेश अग्रवाल को तंवर ने समिति का संयोजक बनाने का मकसद कहीं पार्टी फंडिंग तो नहीं ?
  •  कांग्रेस नेताओं ने इस समिति की पहली बैठक से कांटी कन्नी, कमेटी का नाम बदलकर किया ग्रुप

महेश मेहता | हिसार
लगता है तंवर के इन दिनों हौंसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें न किसी कांग्रेस नेता के विरोध का डर रह गया है और न ही हरियाणा कांग्रेस प्रभारी और कांग्रेस वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद का डर। यही कारण है कि अशोक तंवर किसी की भी परवाह किये बगैर अपना रास्ता प्रशस्त करते जा रहे हैं। वह खुद को एक काबिल कांग्रेस नेता और प्रदेशाध्यक्ष की ताकत दिखाते हुए विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। हाल में जब उन्होंने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समन्वय समिति के तर्ज पर चुनाव योजना एवं प्रबंधन समिति का गठन किया था, तब इसे लेकर गुलाम नबी आजाद ने एक ऐसा बयान दिया जिससे अशोक तंवर ने नाराज कांग्रेस नेताओं के चेहरे पर मुस्कान तो जरूर आ गयी, बल्कि कुछ कहने भी लगे कि अच्छा हुआ अशोक के पर कांट दिए।

हरियाणा में कांग्रेस की गुटबाजी समाप्त करने के लिए हरियाणा में कांग्रेस प्रभारी के तौर पर आये गुलाम नबी आजाद ने अशोक तंवर द्वारा बनायी गयी कमेटी पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा था कि घर पर बनायी कमेटी को पार्टी की मान्यता नहीं। इसी के साथ गुलाम नबी आजाद ने अशोक तंवर की न केवल बेइजती कर दी, बल्कि उनकी कमेटी के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया। इसको देखकर लगा था कि अशोक तंवर थोड़ा शांत रहेंगे और पीछे हट जायेंगे, मगर अशोक तंवर इतने जल्दी थोड़े ही पीछे हटने वाले थे। उन्होंने गुलाम नबी आजाद की बात को ठेंगा दिखाते हुए पहले से निर्धारित चुनाव योजना एवं प्रबंधन समिति की पहली बैठक दिल्ली में आयोजित की, मगर यह बात अलग है कि उन्होंने कांग्रेस के जिन-जिन नेताओं को निमंत्रण भेजा था वह इस बैठक में नहीं आये। हालांकि सबसे मजेदार बात यह है कि अशोक तंवर और सुदेश अग्रवाल ने इस कमेटी का नाम जरूर बदल दिया और कहा यह टेस्टिंग है। भाई अशोक तंवर जी टेस्टिंग कर किसपे रहे हो, जब आपकी कोई सुनता ही नहीं।

कमेटी का नाम बदल कर किया चुनाव योजना एवं प्रबंधन ग्रुप

यूं तो गुलाम नबी आजाद ने इस कमेटी को ख़ारिज कर दिया था और तंवर के खिलाफ कड़ी टिपण्णी की थी। याद रहे कि आजाद ने रविवार को इस कमेटी को गैर-कानूनी बताते हुए इस पर रोक लगा दी थी। यही नहीं, आजाद ने यहां तक कहा था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पास इस तरह की किसी भी कमेटी के गठन के अधिकार नहीं हैं। मगर बावजूद इसके अशोक तंवर ने गुलाम नबी आजाद की परवाह किए बगैर कमेटी की पहली बैठक दिल्ली में आयोजित की। बैठक में उपस्थित डॉ. अशोक तंवर व सुदेश अग्रवाल महत्वपूर्णं विषयों पर चर्चा की। पहले तो बैठक में दोनों नेताओं ने माना कि इस तरह की कमेटी का गठन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ही करती है, इसलिए यह कमेटी फिलहाल टेस्टिंग के लिए होगी, ताकि यह पता चल सके ऐसी कमेटी का फायदा होगा या नहीं।

इसके बाद ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से इसकी अनुमति ली जाएगी। इतना ही यह भी बताया कि फिलहाल कमेटी का नाम बदलकर चुनाव योजना एवं प्रबंधन ग्रुप रख दिया गया है। इस ग्रुप का आने वाले समय में विस्तार भी किया जाएगा और छह उपसमूह बनाए जाएंगे। जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ऐसे मामलों की कमेटी गठित कर देगी तो इन ग्रुप को भंग कर दिया जाएगा।

दुबई के व्यापारी सुदेश अग्रवाल पर अशोक तंवर का प्रेम कहीं पार्टी फंडिंग के लिए तो नहीं?

62 साल के सुदेश अग्रवाल दुबई में 1975 में जाकर अबसे और आज सबसे बड़े उद्योगपति हैं। उनकी गिनती आज मध्य-पूर्व एशिया के सर्वधानिक 50 भारतीय मूल के अमीरों में होती है। मूल रूप से वह रोहतक जिला के निवासी हैं और मैनेजमेंट एक्सपर्ट हैं। भारत और यूनाइटेड अरब अमीरात के बीच कारोबार बढ़ाने में काफी योगदान रहा है। सुदेश अग्रवाल नवंबर 1975 में यूएई चले गए और 1979 में अपना खुद का कारोबार शुरू किया। 1989 तक उन्होंने सबसे बड़ी (जीआरपी) उद्योग की स्थापना की। आज उनके नेतृत्व में कंपनी मध्य पूर्व में सबसे सफल उद्योग में से एक है। अग्रवाल ने दुबई में पैसे तो कमाए मगर वह चाहते थे कि वह देश की सेवा करें और उन्हें सबसे कार्यशील रास्ता नजर आया तो वो था राजनीति। पहले तो उन्हें भारत की हर पार्टी भ्रष्ट दिखी तब उन्होंने 2008 में खुद की पार्टी का गठन किया। जिसका नाम था समस्त भारतीय पार्टी।

खुद उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उनकी पत्नी नीलम अग्रवाल प्रदेशाध्यक्ष। दोनों ने कई चुनाव ही नहीं लड़े, बल्कि अपनी पार्टी से प्रत्याशी भी मैदान में उतारे। 2014 विधानसभा चुनाव में उन्होंने इनेलो से हाथ भी मिलाया। पैसा पानी की तरह बहाने के बावजूद नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे। इस साल अप्रैल में निराश होकर उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस पार्टी में कर दिया। जब सुदेश अग्रवाल को यह लगा कि कोई मीडिया उन्हें कवरेज नहीं दे रहा तो उन्होंने खबरंे अभी तक खरीद लिया। लेकिन उनकी राजनीति चली नहीं, बाद में उन्होंने इस चैनल को बेच दिया और पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया। मगर अशोक तंवर ने सुदेश को राजनीति के केंद्र बिंदु में लाकर उन्हें चुनाव योजना एवं प्रबंधन समिति का संयोजक बना दिया। दुबई के इस व्यापारी पर अशोक तंवर का इतना प्यार क्यों उमड़ रहा है इसका अंदाजा समझदार समझ सकते हैं। स्थिति को देखकर बड़ा सवाल यह उत्पन्न हो रहा कि सुदेश अग्रवाल विधानसभा चुनाव में पार्टी के बहुत काम आएंगे, जिस कारण उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई।

किसके इशारे पर अशोक तंवर ने ली बैठक?

यह सवाल पाठको के जहन में जरूर आता होगा। इतना ही नहीं कांग्रेस कार्यकर्ता भी सोचते होंगे कि जब गुलाम नबी आजाद की बात भी अशोक तंवर अनसुना करें तो वह ऐसा किसके इशारे पर कर रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि अशोक तंवर को हो सकता है ओवरटेक करने की कोशिशों में गुलाम नबी आजाद ने ऐसे कड़े तेवर अखित्यार कर कमेटी को भंग कर दिया था, मगर बावजूद इसके अगर अशोक तंवर ऐसी बैठक आयोजित करते हैं तो इसका अर्थ साफ़ है कि उन्होंने राहुल गाँधी का समर्थन रहा हो, इसलिए वह इस बैठक का आयोजन कर पाए। हालांकि उन्होंने कमेटी को ग्रुप में तब्दील कर अपनी ताकत का परिचय दिया साथ ही दिखा दिया कि आखिर में सभी को टिकट के लिए उनके पास ही आना होगा।

कांग्रेस नेताओं ने काटी कन्नी 

माना जाता है कि कांग्रेस की गुटबाजी के कारण कांग्रेस लोकसभा चुनाव में हरियाणा की सभी 10 सीटें हार गई थी। इसलिए समय रहते विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी अपनी तैयारी शुरू कर दे। इसलिए अशोक तंवर ने जिस कमेटी का गठन किया उसकी ताकत को बढ़ाने के लिए उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को इसमें सदस्य बनाया था, इतना ही नहीं इस पहली बैठक में तंवर ने कांग्रेस के नेताओं को निमन्त्रण भी भेजा था। तंवर ने दिल्ली में कांस्टीट्यूशनल क्लब में सोमवार को शाम 5 बजे बैठक बुलायी थी। बैठक में 8 में से मात्र 2 सदस्य खुद तंवर और संयोजक सुदेश अग्रवाल ही पहुंचे।

दोनों की बैठक हुई। बाकी कोई भी वरिष्ठ नेता नहीं पहुंचा। बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, विधायक दल कि नेता किरण चौधरी, पूर्व सांसद कुलदीप बिश्नोई, कैप्टन अजय सिंह यादव, रणदीप सुरजेवाला, राज्यसभा सदस्य कुमारी सैलजा समेत कई नेताओं ने गुलाम नबी आजाद के कमेटी को लेकर कड़ी टिपण्णी के बाद कोई भी वरिष्ठ नेता इस बैठक में नहीं आया और उसने इस बैठक से कन्नी काटना ही उचित समझा।

तंवर को कहां से मिली आजाद को नजअंदाज करने की आजादी

हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी गुलाम नबी आजाद की नाराजगी और आपत्ति का भी असर प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर को नहीं हो रहा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर ने गुलाम नबी द्वारा खारिज किए जाने के बावजूद उन्हें ठेंगा दिखते हुए बैठक आयोजित कर भाजपा को कांग्रेस की आपसी कलह के नजारे देखने और मजे लेने का मौका दे दिया, बैठक से अन्य नेताओ की दुरी ने भी यह साबित कर दिया कि गुटबाजी और कलह के दाग जल्दी धुलने वाले नहीं है। इस प्रकरण को देखने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि लोकसभा चुनाव में करारी हार के बावजूद हरियाण कांग्रेस के दिग्गज नेता एकजुट होने को तैयार नहीं हैं। हरियाणा में इनेलो और जननायक जनता पार्टी के नेता जिस तेजी के साथ भाजपा में शामिल हो रहे, उसे देखकर लग रहा कि अब सिर्फ कांग्रेस ही विपक्ष के रूप में बची है। कांग्रेस दिग्गजों के बीच झगड़े से कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा को विधानसभा चुनाव में भी क्लीन स्वीप करने से रोकना मुश्किल होगा।

बता दें कि हरियाणा के चुनावी रण में भाजपा ने विधानसभा चुनाव में 75 से अधिक विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है। भाजपा को अब न तो इनेलो की चिंता है और न ही जननायक जनता पार्टी का कोई डर। आम आदमी पार्टी, बसपा और लोकतंत्र सुरक्षा पार्टियां भी हाल फिलहाल भाजपा को कोई बड़ी चुनौती देती दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में सिर्फ कांग्रेस बची थी, जो विधानसभा चुनाव में भाजपा के मिशन 75 को फतेह करने में बाधा उत्पन्न कर सकती है। लेकिन, कांग्रेस की कलह देखकर नहीं लगता कि इसके दिग्गज नेता मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। यही कारण है कि कांग्रेस में इस कलह का सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है और इससे विधानसभा चुनाव में उसके मिशन 75 में मदद मिल सकती है।

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