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मनो फहराएंगे भाजपा का परचम

लोकसभा में 90 में से 79 हलकों में बढ़त के साथ भाजपा का विश्वास दोगुना

अर्चना त्रिपाठी | हिसार टुडे

लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी अब विधानसभा चुनावों को जीतने की दिशा में पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज है। 2009 में जो भारतीय जनता पार्टी 4 सीट से सीधे 2014 में 47 सीटों तक पहुंची और इस बार लोकसभा में 90 हलकों में से 79 हलकों में उसने बढ़त हासिल की, उससे भाजपा को विश्वास है कि इस बार विधानसभा 2019 में भाजपा एक नया इतिहास रचेगी। भाजपा के इस विश्वास का कारण बिखरा विपक्ष है। जो कांग्रेस लोकसभा में उनके लिए सबसे बड़े मुकाबला बनकर साबित हुयी थी, आज वही कांग्रेस आपसे में भीड़ कर समय बर्बाद कर रही है। इसलिए कहा जा रहा है कि इसका लाभ भाजपा को होगा और भाजपा बड़े मार्जिन से जीत हासिल करेगी।

क्या बीजेपी हरियाणा विधानसभा में भी जीतेगी?

वैसे बता दुं कि बीजेपी ने हरियाणा में पहली बार अपने दम पर 1991 में विधानसभा चुनाव लड़ा था। तब बीजेपी को 90 में से सिर्फ 2 सीटें मिल पाईं थीं और 70 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। उसके बाद आए कई चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को अपना अस्तित्व बचाने के लिए गठबंधन का ही सहारा लेना पड़ा था। मगर साल 2014 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए मील की पत्थर बनकर साबित हुआ था। इस चुनाव में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर सरकार बनायी। अगली परीक्षाएं भी उसने पार की और 2019 के लोकसभा चुनावों में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने अपने दम पर सभी 10 सीटें हासिल कर प्रदेश के 58% वोटों को अपने नाम करने के साथ ही आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी जीत की उम्मीदें मजबूत कर दी।

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गलती बीजेपी की जीत?

वैसे भाजपा को विधानसभा चुनाव में अपने जीत की उम्मीद इसलिए है क्योंकि उन्हें कांग्रेस हाईकमान की गलती का भरपूर फायदा इस विधानसभा चुनाव में होगा। क्योंकि आपको याद होगा कि कांग्रेस हाईकमान ने कांग्रेस ने अपने सभी बड़े नेताओं को चुनाव में उतारा था जिनमें से ज्यादातर नेता सीएम पद के उम्मीदवार भी माने जाते है। लेकिन कोई भी उम्मीदवार कांग्रेस के लिए सीट नहीं जीत पाया। ऐसे में भाजपा को इस मुद्दे को भुनाने का मौका मिल गया। यह सभी जानते है कि हमेशा लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे काफी हावी होते हैं। मगर इस मुद्दे को साईडलाइन कर, भाजपा की जीत के लिए हरियाणा के राजनीतिक विश्लेषकों ने हरियाणा कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी को प्रमुख तौर पर जिम्मेदार ठहराया। भाजपा ने भी यह मुद्दा भुनाया कि जो एक जुट नहीं, अपनी सीट नहीं बचा पाया वो क्या विधानसभा चुनाव जीतेगा। वैसे एक कारण यह भी है कि आज हरियाणा कांग्रेस के बड़े नेता अब खुद को सीएम पद पर ज्यादा देखना चाहते हैं और पार्टी के लिए काम करने की इच्छा उनमें कम दिखाई देती है।

बीजेपी दोहरा पाएगी विधानसभा में प्रदर्शन

इन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस हिसार सीट को छोड़कर सभी सीटों पर दूसरे स्थान पर रही है। इसलिए माना जा रहा है कि इस बार विधानसभा में भी असली टक्कर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होगी। एक महत्वपूर्ण बात जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इस बार लोकसभा चुनावों में भाजपा को 90 हलकों में से 79 हलकों में बढ़त मिली है। जबकि इस महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान देने के बजाय कांग्रेस का हुड्डा कैंप अशोक तंवर के इस्तीफे की मांग कर अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। वैसे हरियाणा की अधिकतर जनता राज्य की मनोहर लाल सरकार के कार्यकाल को बेहद सराहना कर रही है। खास कर नौकरियों में पारदर्शिता और ऑनलाइन तबादलों के साथ विकासशील परियाजना, लिंगानुपात में सुधार आदि। जाट आंदोलन को समाप्त करने का श्रेय भी मनोहर को जाता है, जिससे नॉन जाट का झुकाव भाजपा की तरफ बढ़ा है।

राष्ट्र और देश प्रेम का मुद्दा हर चुनाव में डालेगा असर

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हरियाणा को बलिदानो की भूमि मानी जाती है। यहां पर अधिकतर घर से कोई न कोई युवा या युवती फौज में है। जाट रेजिमेंट का नाम लेते ही हरियाणा की ऊंची कद काठी के मजबूत बहादुर जवान आँखों में दिखाई देते हैं। घाटी में अक्सर बलिदानो में, कोई न कोई बलिदानो में हरियाणा का युवा जरूर होता है। यही कारण है कि हरियाणा में हर चुनाव में देश प्रेम बहुत मजबूत फैक्टर बनकर साबित होता है। पुलवामा हमले के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक करवाकर पकिस्तान को मुँह तोड़ जवाब दिया था। उसके बाद हरियाणा के लोकसभा चुनाव में इसका साफ असर दिखाई दिया। भजपा के जिन सांसदों का जनता विरोध कर रही थी, सभाओं में उनके भीड़ जुटाना मुश्किल था, वो भाजपा के प्रत्याशी लाखों के मार्जिन से जीते तो किसी आश्चर्यचकित परिणामों से कम नहीं। इस बार भी जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बोल्ड कदम के कारण अब इसी राष्ट्र की सुरक्षा का मुद्दा विधानसभा चुनाव में उनके जीत की राह प्रशस्त करेगा।

क्या भाजपा को जाट बनाम गैर-जाट की राजनीति का फायदा हुआ?

हरियाणा की राजनीति को सालों से देखते आ रहे राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जाट बनाम गैर-जाट का मुद्दा था तो लेकिन इसका असर इस बार लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नहीं था। दरअसल विपक्ष बिखरा हुआ था। कांग्रेस की गुटबाज़ी के अलावा इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का बिखराव भी एक बहुत बड़ा फैक्टर था जो भाजपा के पक्ष में गया। उसके दो-फाड़ होने के बाद जो वेक्यूम आया, उसे कांग्रेस नहीं भर पाई। इस लोकसभा चुनाव में जाट वोटर बेहद दुविधा में था कि वो कहां जाए ? इनेलो में जाए या कांग्रेस में ? इसी दुविधा का फायदा भाजपा लूट ले गयी। हरियाणा की राजनीति का इतिहास देखें तो भजनलाल अपने आप को जाट साबित करने की कोशिश करते रहते थे। लेकिन जब जाटों ने उन्हें जाट स्वीकार करने से मना कर दिया तो उन्होंने जाट बनाम गैर जाट की राजनीति शुरू कर दी थी और उन्हें इसका फायदा भी हुआ। 2009 के चुनाव में वे कांग्रेस से अलग हो गए थे। 2009 में कांग्रेस को 9 सीटें तो मिली और एक भजनलाल को भी और कुछ महीने बाद ही विधानसभा में कांग्रेस को 40 सीटें ही आईं। बहुमत से 5 सीटें कम रही थी। यानी गैर-जाटों ने कांग्रेस को नहीं अपनाया था। यही मुद्दा इस बार भाजपा के लिए संजीवनी बनकर साबित हुआ।

इनेलो और जेजेपी का क्या है भविष्य

अक्सर हरियाणा में आमतौर पर हर चुनाव में तिकोना मुक़ाबला होता रहा था, जिसमें इंडियन नेशनल लोकदल प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला की एक भूमिका होती थी। चौधरी देवीलाल की विरासत पर चल रही पार्टी अचानक पिछले साल दो फाड़ हो गई। ओमप्रकाश चौटाला के पोते दुष्यंत चौटाला ने अलग होकर जननायक जनता पार्टी बना ली। लेकिन इन चुनावों में इनेलो के सभी उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त भी हो गई। साथ ही इस बार जेजेपी को भी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का कोई फायदा नहीं हुआ। जानकार मानते हैं कि आने वाले विधानसभा चुनावों में जेजेपी और इनेलो को इन चुनावों में फायदा नहीं होगा क्योंकि मतदाता नाराज़ है। जब इनेलो के बिखराव से पहले बसपा का समझौता हुआ तो लगा कि इनकी सरकार आ सकती है। लेकिन इनेलो के बिखराव ने मतदाता को बेचैन कर दिया और इन लोकसभा चुनाव में उनका वोट कांग्रेस और बीजेपी में चला गया। वहीं फिलहाल इनेलो संभाल रहे अभय चौटाला की इतनी स्वीकार्यता नहीं है।
जितना उनके पिता ओम प्रकाश चौटाला की अपनी स्वीकार्यता।

अशोक तंवर और भूपेंद्र हुड्डा

आज हरियाणा में किसी को भी पूछो तो वह कहेगा कि हरियाणा कांग्रेस के एक गुट के मुखिया अशोक तंवर है तो दूसरे गुट के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा माने जाते हैं। इन चुनावों में भूपेंद्र हुड्डा ने जाट हार्टलैंड की दो प्रमुख सीटें- रोहतक, सोनीपत की टिकट अपने और अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा के लिए झटक ली। साथ ही करनाल और कुरूक्षेत्र भी अपने क़रीबी कुलदीप शर्मा और निर्मल सिंह को दिलाई थी। भूपेंद्र हुड्डा की सीट को कांग्रेस के लिए सबसे सुरक्षित सीट माना जा रहा था लेकिन उन्हें डेढ़ लाख से भी ज़्यादा वोटों से भाजपा के प्रत्याशी रमेश कौशिक ने हरा दिया। इसी सीट पर पिछली बार रमेश कौशिक तक़रीबन 77 हज़ार वोटों से जीते थे। इतना ही नहीं हुड्डा के गढ़ रोहतक में भी पहली बार भाजपा को सीट मिली। दीपेंद्र हुड्डा ने 2014 में कांग्रेस की लिए ये एकमात्र सीट जीती थी लेकिन इस बार लगभग सात हज़ार के अंतर से हार गए। इससे पहले जनसंघ की टिकट पर दो सांसद यहां से बने हैं।

कमजोर और बिखरा विपक्ष भाजपा के लिए संजीवनी

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